Thursday, 19 February 2026

Near-midnight thoughts, and questions


Reminiscences from my diary

Feb 20, 2026
Friday 0015 IST
Murugeshpalya, Bangalore


नए साल में रानीखेत होना सुखद रहा।  सोच रहा हूँ  कभी वृन्दावन भी हो आऊँ। अक्टूबर ख़त्म होते-होते धर्मशाला जाना चाहता हूँ, और वरकला भी। यूँ भी केरल गए एक साल से ज़्यादा हो गया।  दिसंबर में कोन्या जाने की आस कब से दम साधे बैठी है। 

यायावरों के घर घर होते हैं या सराय ?

कल पूरी रात अजीब मौसम रहा। पंखा चलाओ तो सर्दी, न चलाओ तो गर्मी। एक ख़ुमारी छायी रही - जागते हुए भी, नींद में भी, और नींद में आते सपनों में भी। कुछ याद रहे , कुछ भूल गए, कुछ को भुला दिया। 

सपनों के ओर-छोर कहाँ ढूँढे जा सकते हैं ?

कुछ अनकही के सोहलवें एपिसोड में फूफी एकाएक बोल पड़ी - पुश्तैनी घर न हुआ, सफ़ेद हाथी हो गया, हुह ! मुझे बाबा याद आ गए। बाबा, उनका चेहरा, आँखें, चश्मा, सफ़ेद बाल, भूरी टोपी, हथघड़ी, ठहाके, किस्से, कहानियाँ और मुहावरे।

लोग सच में मरने के बाद तारा बन जाते हैं? 

जब भी घर जाता हूँ तो आड़ू का पौधा सूखा, बंजर मिलता है। ठूँठ। छः साल हो गए। छत पर रखा है - उसी एक जगह। सिर्फ़ माँ की भेजी गयी तस्वीरों में उसके बेहद खूबसूरत गुलाबी फूल देखे हैं, चेरी ब्लॉसम सरीखे, और फूल से बनते फल।  

मेरे शहर का वसंत मुझे अपने पास क्यों नहीं बुलाता?

आजकल कुछ लिखने का मन नहीं करता। कोशिश करता हूँ पर या तो नींद आ जाती है या अजीबियत। ठीक - ठीक नहीं पता। किसी दिन यूँ करूँगा कि एक कविता लिखने बैठूँगा उन सभी बातों, किस्सों, ख़्यालों और लोगों के बारे में जिन पर मैं कई-कई नज़्में लिखना चाहता था। 

ब्रह्माण्ड की सबसे ज़्यादा पीड़ कविताओं के हिस्से क्यों आयी ?




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