Saturday, 18 July 2026

I want to be a teacher

Reminiscences from my diary

July 18, 2026
Saturday 1445 IST
Murugeshpalya, Bangalore


मैं मीलों मील अपने साथ पाँव-पाँव चल सकता हूँ 
अल्मोड़ा के पहाड़ों से चीड़ चुनता हूँ 
प्रशांत में पाँव पखारता हूँ
सोहरा में बारिश चखता हूँ 
पारिजात, मोगरा और कनेर सराह सकता हूँ 
तुलसी, पुदीना और अजवायन में भेद कर सकता हूँ 
शफ़ाक़ और शिवानी को पढ़कर रो पड़ता हूँ 
इशिगुरो को पढ़ते पढ़ते भटक जाता हूँ 
अमृता की चिट्ठियों से प्रेम समझने का प्रयास करता हूँ 
हुसैन और शेरगिल की पेंटिंग्स देर देर ताकता हूँ 
अरविन्द की इमली के नीचे घंटों मौन साध सकता हूँ 

एक व्यस्त नौकरी के साथ साथ अगर ये सब कर सकता हूँ या कर पाया हूँ तो बस इसलिए कि मुझे मेरे गुरुओं ने जीवन के, पृथ्वी के, और एक मानव होने के विभिन्न आयामों के बारे में बेहद सुंदरता से अवगत कराया ! रोम-रोम में स्कूल बसा है मेरा, रोम-रोम में अपने गुरुओं के प्रति धन्यवाद, ईश्वर के प्रति आभार! 

प्रभाव इतना गहन कि बचपन से ही कोई पूछता कि क्या बनना चाहते हो, मैं तपाक से कहता - टीचर ! एक सपना जो जिजीविषा में घुला हुआ है ! सहारनपुर में स्कूल के १२ वर्ष, पटिआला में चार साल स्नातक, भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर से स्नातकोत्तर, १३ साल एक बैंकर की नौकरी, हॉन्ग कॉन्ग, जापान, लंदन, या अमेरिका - जहाँ भी गया, जहाँ भी रहा  - सपना पकता रहा शिद्दत से, कभी कभी बेचैनी से भी  - साल दर साल, उम्र दर उम्र !

पापा ने नहीं चाहा मैं पढ़ाऊँ  - समझाया, बुझाया पर उन्हें मना नहीं पाया ! बावजूद इसके अपनी तरफ से जितनी कोशिश कर सकता था उतनी की - शुरुआत की सहारनपुर से - अपने एल्मा मेटर में २ महीने पढ़ाकर ! तीन साल कॉलेज में नॉन टीचिंग स्टाफ के बच्चों को पढ़ाया, एक ट्यूशन-कम-स्कूल जैसा सिस्टम तैयार किया, बैंगलोर आकर ३ साल 'करियर लांचर' में विधि और प्रबंधन की कोचिंग लेते विद्यार्थियों को पढ़ाया, फिर ९ साल माउंट कार्मेल कॉलेज में बतौर गेस्ट फैकल्टी पढ़ाया ! स्वयं को जिस हद तक भी एक अध्यापक होने के करीब रख सकता था, उतना रखा ! और इस बात की बहुत ख़ुशी, बहुत सुकून, बहुत गर्व भी है !

अब चाहता हूँ, जीवन में अगले पड़ाव पर पहुँचूँ ! पूरी तरह से टीचर बनूँ! अपने गुरुओं से, किताबों से, जीवन से, अनुभवों से जो सीखा है उसे नयी पीढ़ी के साथ साझा करूँ ! कोशिश करूँ एक ऐसा शिक्षक बनने की जो किसी जिज्ञासु को अंतर्यात्रा के लिए प्रेरित कर सके क्योंकि अभी भी आशा है कि  ए आई और जिम वाली दुनिया में शिक्षक सहेज पाएँ मनुष्य होने की लौ !


I have walked miles at ease with myself.
I have gathered pine cones from the hills of Almora.
I have dipped my feet in the Pacific.
I have tasted the rains of Sohra.
I can admire the parijat, mogra, and kaner in bloom.
I can tell tulsi, mint, and ajwain apart by scent alone.
I have wept reading Shafaq and Shivani.
I have lost myself wandering through Ishiguro.
I have sat in silence for hours under Arvind's tamarind tree.

If I have been able to experience life in these ways alongside a demanding career, it is because of my teachers, who gently awakened my attention to the world, to nature, to art, and to the inner life. My school lives in every ounce of my being, and I carry enduring gratitude for my teachers and the higher forces above us.

As a child, whenever anyone asked me what I wanted to become, my answer came without hesitation: a teacher. It never felt like a career choice but a dream inseparable from my will to live. Twelve years of schooling in Saharanpur laid this foundation; four years of undergraduate study in Patiala and a postgraduate degree from the Indian Institute of Science, Bangalore, only strengthened it. During the thirteen years that followed, as a banker at Goldman Sachs across Bangalore, Hong Kong, Japan, London, and the United States, — the aspiration only deepened: sometimes in contemplation, sometimes in restlessness.

My father did not want me to become a teacher, citing financial obligations and social status. Yet I could not let go of the dream. I spent two months teaching at my alma mater in Saharanpur, three years building a small tuition-cum-school system for the children of non-teaching college staff in Patiala, three years teaching law and management aspirants at Career Launcher, Bangalore, and the last nine years as guest faculty at Mount Carmel College. Alongside my corporate career, I stayed as close to teaching as circumstances allowed, and that gave me deep joy, peace, and contentment.

I now wish to take the next step of becoming a full-time teacher, in the spirit this Foundation holds dear — not to fill young minds with answers, but to walk alongside them as they question, observe, and come to know themselves. Whether through literature, statistics, or the social sciences, I want to teach not as one who has arrived, but as one who is still seeking, using the classroom as a place to continue my own inward journey while helping curious minds discover their own. In a world increasingly shaped by AI and instant gratification, I aim to be a teacher who could help nurture inquiry, attention, empathy, and the capacity to observe deeply—qualities that keep alive what is most deeply human in us.


 

Saturday, 11 July 2026

Love Love All Around!


Reminiscences from my diary

July 11, 2026
Saturday 2145 IST
Murugeshpalya, Bangalore


मैंने 
इस पृथ्वी के 
सबसे सुन्दर व्यक्ति से प्रेम किया 

इस संसार में 
हर किसी का प्रेमी उसके लिए 
सबसे सुन्दर व्यक्ति होता है 

ईश्वर करे इस ब्रह्माण्ड में 
हर व्यक्ति किसी न किसी के लिए 
सबसे सुन्दर हो !

Thursday, 25 June 2026

Tibet Diaries : Day 5

Reminiscences from my diary

June 25, 2026
Thursday, 2300 HKT
Saga, Tibet

हिमालय के विस्तार को देखकर मैं एक बार फिर हैरान हूँ ! भौचक्का, एकदम! कितने रूप, कितने रंग, कितने पैटर्न! कैसे हो पाया होगा! भूगोल और भौतिकी कुछ भी कहे, ब्रह्मांड की माया के बिना संभव नहीं!
बर्फीले हिमालय, बंजर हिमालय, हरे हिमालय, गहरे हरे हिमालय, ऊँचे हिमालय, नीचे हिमालय, नक्काशीदार हिमालय, सूखे हिमालय, गीले हिमालय पर अंत में :

सुंदर हिमालय 

एवरेस्ट बेस कैम्प को जाती सीधी सपाट सड़क देखी 
ब्रह्नमपुत्र का बचपन देखा 
देखी ल्हासा की उदासी 
और बहुत सारे याक 

ऑक्सीजन का कम होना क्या होता है, पहली बार महसूस किया , अच्छे से महसूस किया! अपूर्वा आंटी ने गले में कपूर की छोटी सी पोटली डाल दी है - उनका कहना है इससे मदद मिलेगी!

४००० मीटर की ऊँचाई पार हो गई है ! कल ४०० किलोमीटर का सफ़र नापना है !

शिव, साथ रहना !

Wednesday, 24 June 2026

Tibet diaries - Day 4

Reminiscences from my diary

June 24, 2026
Wednesday 2230 HKT
Gyoring (somewhere past Tibet border)

धूप 
थकान 
अजीबियत 
हताशा 
निराशा 
हुकूमत 
पहाड़ उदास 
धुंध उदास 
चाँद उदास 

बड़ी सी जेल है तिब्बत 
अगर तिब्बत है तो 

बस इतना ही 
पूर्ण विराम !

Tuesday, 23 June 2026

Tibet diaries : Day 3

Reminiscences from my diary

June 23, 2026
Tuesday, 1930 NST
Somewhere near Tibet border

ये सात घंटे मेरी पहाड़ी यात्राओं का शायद सबसे खतरनाक सफ़र रहा होगा। पूरे रास्ते पर, रास्ते के हर इंच पर भूस्खलनों के बाद का मलबा, पत्थर ही पत्थर, और उन पर डोलती बस हमारी। डगमग डगमग! अब गए कि तब गए ! कोई बैरिकेड नहीं, कोई बचाव नहीं, ज़रा सी गाड़ी इधर उधर हुई नहीं कि सीधा त्रिशूली में, अगर बीच की चट्टानों से बच गए तो! और त्रिशूली - लगभग पूरे रास्ते हमारे साथ साथ चलती रही - पूरे वेग के साथ , पूरे शोर के साथ। काठमांडू से २०० किलोमीटर दूर तिब्बत सीमा जाता नेपाल का यह हिस्सा बहुत रस्टिक है। मुझे याद आता रहा कभी कभी मणिकरण, कभी कभी भूटान ..

छोटा सा गाँव है , सादा सा कमरा ! नीचे त्रिशूली , ऊपर प्रार्थनाओं के झंडे ! उनके पीछे बीच बीच में दिखते पद्मसंभव ! सुनहरे रंग के ! कंधे पर त्रिशूल और उसके दंड पर टिके तीन नरमुंड ! ठंडी तेज़ हवा, ठीक ठाक ऊँचाई, बीच बीच में आती मुस्कुराहट, लता मंगेशकर ..

कुछ जन्म और कुछ दिन - बेतरतीब ही रहते हैं ! समझ से परे! कभी दो कविताएँ, या २३ तस्वीरें, कभी २५ अजीबोगरीब उपहार, और कभी तथागत को टुकुर टुकुर ताकते बस एक मंगलकामना ..

Monday, 22 June 2026

Tibet Diaries : Day 2

Reminiscences from my diary
Monday, June 22, 2026
2200 NST
Kathmandu

मैंने देखा 
कई सौ कबूतरों के बीच बहमाया एक कबूतर सफ़ेद 
और देखे 
बड़े से पीपल के नीचे, कुंड के बीचों बीच,  शेषनाग के अंक में झपकी लेते नारायण
और
हिमालयन जावा कॉफ़ी हाउस में नेपाली टोपी पहने दो खिलखिलाते पुर्तगाली
और 
सोमवार की भीड़ से, हम जैसे लाखों लोगों से शायद परेशान पशुपतिनाथ 
और 
न्यू लुंबिनी भोजनालय के बाहर घुटनों तक बाल बनाती एक लड़की 
और
शिव के लाखों भक्तों की उदासीनता समेटे नदी तट पर एक शांत एकांत शक्तिपीठ 
और
ताज़ा फूलों की कई कई गठरियाँ पीठ पर लादे एक बूढ़ा कुबड़ा 
और
विशालकाय नंदी के पास एक क़तार में बैठी छः भगवा सन्यासिनें 

मैंने देखा 
एक हाथ में बाबुषा की किताब और दूसरे हाथ में ज़ाफ़रानी चाय का सफ़ेद कप लिए काँच के पार न जाने क्या खोजता मैं

Sunday, 21 June 2026

Tibet Diaries : Day 1


Reminiscences from my diary

Sunday, June 21, 2026
2130 Nepal Time
Kathmandu


अलसायी आँखों से नीचे देखा तो देखता ही रह गया। असल में नीचे नहीं, बगल में। पहाड़ साथ साथ से चलते लग रहे थे।सबसे पहले अनुराधा रॉय और उनकी कही बात याद आ गई फिर से , एकदम से। “पहाड़ धरती से उठी लहरें हैं , ऐसी लहरें जो उठीं और बस उठीं ही रह गई , कभी वापस नहीं गईं ।” अब मैं यह सोच रहा हूँ कि उन्होंने यह बात रानीखेत की फ़िज़ा देखकर लिखी थी या फिर मेरी ही तरह तरह काठमांडू जाते जहाज़ की खिड़की से दिखते हिमालय की परतों को देखकर । ख़ैर ..

त्रिभुवन सादा है काफ़ी। और अब तक देखा शहर भी।सादे ही लोग, सादी सड़कें,  सादी गलियाँ, सादे घर, दुकानें, मीनारें। दिन भी सादा, शाम भी, शाम का सन्नाटा भी। - सब कुछ सादा। जान में जान सी आयी। मानो सादगी से मिले मुद्दत बीत गई थी। ख़ैर ..

इश्क़ शर्त के साथ आता है, और शर्त दर्द के साथ। शम्स ने इत्मीनान से इश्क़ तोला और तोलकर बोला कि इस शर्त की रवायत यूँ कि कोई शर्त न हो महबूब से।किसी भी मुक़ाम में नहीं। इस बात के इर्द गिर्द मंडराती पीड़ जो कर पाओ अपनी नसों में शामिल तो सच्चे सूफ़ी कहलाओ! बात बस सुई की चुभन जितनी ही है और यह भी इस चुभन से ही सीना होता है शरीर का, शरीर के अंदर तक का रेशा रेशा ! ख़ैर ..

एक ख़याल से दूसरा ख़याल कब और कैसे दस्तक दे जाता है , कैसे समेटी जा सकती है यादों की पोटली, कैसे सही जाती है जीते जी भुलाए जाने की पीड़ , यह भी ज़रूर किसी दरवेश , सूफ़ी या मौलाना ने बताया होगा , या होगा दफ़न कहीं इन परतों के बीच ! ख़ैर ..

पशुपतिनाथ के पशुपतिनाथ - कल मिलना होगा! तुम्हें देखकर रो ही पड़ूँगा ..

Saturday, 13 June 2026

Evening blues

Reminiscences from my diary

June 23, 2026
Saturday 2015 IST
Menasi, Doddaballarpur



मैं जहाँ हूँ वहाँ कोई नहीं है 
बस
मिट्टी का कच्चा रास्ता है
दोनों ओर टीक के पेड़ हैं 
उनसे पाँच पंखुड़ी वाले छोटे-छोटे हज़ारों सफ़ेद फूल झड़ रहे हैं 
शाम थक चुकी है 
अँधेरा गहराता जा रहा है 
स्ट्रीट लाइट या लैंप पोस्ट जैसी कोई चीज़ नहीं है 
अभी अभी बरसात शुरू हुई है 
गिरती बूँदों की आवाज़ तेज़ होती जा रही है 

और

अचानक से
बिल्कुल अचानक से 
पूरी पगडंडी जुगनुओं से पट गई है

Saturday, 16 May 2026

Randomness yet again

Reminiscences from my diary

May 16, 2026
Saturday, 2245 IST
Murugeshpalya, Bangalore


धीमी-सी भोर धीमी-सी शाम, धीमा-सा मैं धीमा-सा जाम 
प्रशांत पाँव पखारता रहा, मैं सोच-सोच बौराता रहा 
अस्त-व्यस्त रही बाल्कनी, बाल्कनी का सारा हरा 
कुछ ख़्वाब-ख़्वाब कुछ आग-आग, बेमौत मर गया एक तारा 
बीत गया समय बहुत, नहीं जाती बावन चिट्ठियों की ख़ुमारी  
एक सौ चालीस सीढ़ियाँ उतरनी हैं एक घर तक पहुँचने के लिए  
माँ अपनी सहेली के साथ देर तक बतियाती रहती चौखट पर 
एक दिन मिल ही जाएगी नास्तिक की प्रार्थना, साथ में ढेर सारा डोपामाइन 
नहीं लिखना था कुछ फिर भी स्वाहा हुआ एक पन्ना सफ़ेद 
इन हालातों में कैसे जाया जायेगा इस्तानबुल

Sunday, 10 May 2026

Slow acceptance

Reminiscences from my diary

April 29, 2026
Wednesday 0100 AM
Cannon Street, London


तुम्हारा होना
धीमा ज़हर
तुम्हारा न होना
धीमा ज़हर

युग बीत गए
नीलकंठ होते होते

Saturday, 9 May 2026

Distant trains | Moving homes | Dog years

Reminiscences from my diary

April 26, 2026
1230 pm 
Amsterdam


पुराने घर में एक कमरा था
ऊबढ़ खाबड़ सा 
माँ जितनी भी कोशिश करती सवारने - सजाने की
इसकी तासीर न बदलती
अनगढ़ था, अनगढ़ ही रहता

एक पलंग, एक ड्रेसिंग टेबल, एक कानिश, दो आले, 
दस लाल कड़ियाँ, 
कड़ियों से जब - तब झड़ता पत्थर - चूने का मलबा,
दो अलमारियाँ, अलमारियों पर सीमेंट के धब्बे, 
सीलन से फूली दीवारें और उतरता पलस्तर

इस थके थके, धीरे धीरे साँस भरते कमरे में 
एक खिड़की टंगी थी 
हरे से रंग की 
पीछे एक संकरी गली में खुलती थी
इतनी संकरी
कि एक समय में दो व्यक्ति से ज़्यादा न गुज़र पाएँ

मैं 
सर्दी के दिनों में 
इस खिड़की के पास कुर्सी मेज़ लगा लेता 
और देर रात तक पढ़ाई करने की कोशिश करता 

हिंदी फ़िल्मी गानों का बेहिसाब शौक रखने वाला मैं
अक्सर इस फ़टी कुर्सी पर बैठा, 
माँ के शॉल में लिपटा 
हिलती - डुलती मेज़ पर कोहनी टिकाए, 
सामने किताब खोले, रेडियो की तमन्ना करता हुआ
खुद को गुनगुनाता हुआ पाता

पूस की इन ठिठुरती सुनसान 
और कभी कभी सीली रातों में 
चार चाँद तब लगते 
जब
तीन किलोमीटर दूर स्टेशन से 
कोई रेलगाड़ी गुज़रती
कभी धीरे धीरे हॉर्न बजाती हुई
तो कभी 
दनादन पटरियाँ थरथराती हुई

मुझे यूँ लगता जैसे किसी ने 
अचानक 
मेरे आस पास 
सुलगा दिए हों आँच के अलाव

कभी कभी घर बदलने से खिड़कियाँ नहीं बदलतीं

Wednesday, 15 April 2026

Bruised blue | Survival instinct | Circling back | Waiting room

Reminiscences from my diary

Apr 15, 2026
Wednesday 2350 IST
Murugeshpalya, Bangalore


विष बैठाया कंठ में
पाया नया नाम 
तुम्हीं बताओ, मृत्युंजय, 
क्या कहें उनको 
मन-वच-काय पर हों जिनके 
नील ही नील 

यह भी भेद बताओ 
कि कोई कैसे सींचे साँस 
जब रखा हो छाती पर 
पूरा का पूरा हिमालय 
क्या कहें उनको जो पहाड़ ढोते- ढोते 
हो जाएँ खुद पहाड़

पत्थर टूटे तो वापस 
नदी में हिलमिल जाता है 
तुम भी तो जब तब 
कैलाश लौट जाते हो 
तो फिर यूँ करो कि कह दो अस्तु और 
हर यायावर को मिल जाए अपना एक घर 

सुनो, एक वर और दो फिर 
कि घर मिले तो घर में मिले 
एक आँगन, एक वट 
एक बेलपत्र, ढेर सारे रुद्राक्ष 
और कभी ऐनक, कभी बिना ऐनक 
मेरी राह तकते टुकुर- टुकुर दो नयन 


Friday, 10 April 2026

Rejection Letter | Empty Chair | Invisible String | Desert Snail 


Reminiscences from my diary

April 11, 2026
Saturday 0230 IST
Murugeshpalya, Bangalore


तुम्हारी हर कुनमुनाहट को
मैंने बेहद तसल्ली से पढ़ा
कई बार पढ़ा, बार-बार पढ़ा   
फिर करीने से काग़ज़ मोड़ा, और  
होंठ की पपड़ियों में अटकी नमी से 
लिफ़ाफ़ा वापिस चिपका दिया 

बड़े कमरे के एक कोने में
रोज़मैरी की गंध लिए 
एक खाली कुर्सी रहती है 
घर की अभिन्न सदस्य सरीखी 
तुम्हारे लिखे सारे ख़तों से 
मेरा घर, मेरा मन और यह कुर्सी  - सब आबाद हैं 

मैंने इंतज़ार किया मौसमों का, चिट्ठियों का भी 
तासीर और तड़प एक ही रही 
मानो मेरे ही रेशे-रेशे से बुनता 
कोई मकड़जाल
अपने ही धागों से सुलझा-सुलझा सा 
अपने ही धागों में उलझा-उलझा सा 

जब-जब तुम्हें लिखने बैठा 
बेतरतीबी बेताल-सी हावी रही 
और एक बेचैनी, जैसे -
आँख में गिर गई हो किरकिरी 
हथेली में भर आयी हो अमावस 
या मचलता हो रीढ़ पर केंचुआ कोई  


Sunday, 5 April 2026

Spring Again | Undercurrent | Songbird | Borrowed Time

Reminiscences from my diary

Monday, Apr 06, 2026
0040 IST
Murugeshpalya, Bangalore


मैंने सबसे अधिक 
विरह के गीत 
वसंत में लिखे

तुम उन्हें पढ़ो तो ध्यान से पढ़ना  
शांत नीर के नीचे पाओगे 
कई कई भँवर

मुद्दत हुई, न आम चखा, न कूक सुनी 
तुम गुनगुना ही दो कुछ 
पुकार लो मेरा नाम ही 

फ़ाग की चौखट पर कील गढ़ी थी 
मेरी एड़ियाँ लहूलुहान हैं 
जाओ, तुम्हें अपने समय उधार दिया 

लेकिन कसम तुम्हें अपने पसंद के गीतों की 
जब आओ तो साथ लाना 
मेरे पतझड़ 
मेरी टीस 
मेरी प्यास 
और मेरा नाम 


Thursday, 19 February 2026

Near-midnight thoughts, and questions


Reminiscences from my diary

Feb 20, 2026
Friday 0015 IST
Murugeshpalya, Bangalore


नए साल में रानीखेत होना सुखद रहा।  सोच रहा हूँ  कभी वृन्दावन भी हो आऊँ। अक्टूबर ख़त्म होते-होते धर्मशाला जाना चाहता हूँ, और वरकला भी। यूँ भी केरल गए एक साल से ज़्यादा हो गया।  दिसंबर में कोन्या जाने की आस कब से दम साधे बैठी है। 

यायावरों के घर घर होते हैं या सराय ?

कल पूरी रात अजीब मौसम रहा। पंखा चलाओ तो सर्दी, न चलाओ तो गर्मी। एक ख़ुमारी छायी रही - जागते हुए भी, नींद में भी, और नींद में आते सपनों में भी। कुछ याद रहे , कुछ भूल गए, कुछ को भुला दिया। 

सपनों के ओर-छोर कहाँ ढूँढे जा सकते हैं ?

कुछ अनकही के सोहलवें एपिसोड में फूफी एकाएक बोल पड़ी - पुश्तैनी घर न हुआ, सफ़ेद हाथी हो गया, हुह ! मुझे बाबा याद आ गए। बाबा, उनका चेहरा, आँखें, चश्मा, सफ़ेद बाल, भूरी टोपी, हथघड़ी, ठहाके, किस्से, कहानियाँ और मुहावरे।

लोग सच में मरने के बाद तारा बन जाते हैं? 

जब भी घर जाता हूँ तो आड़ू का पौधा सूखा, बंजर मिलता है। ठूँठ। छः साल हो गए। छत पर रखा है - उसी एक जगह। सिर्फ़ माँ की भेजी गयी तस्वीरों में उसके बेहद खूबसूरत गुलाबी फूल देखे हैं, चेरी ब्लॉसम सरीखे, और फूल से बनते फल।  

मेरे शहर का वसंत मुझे अपने पास क्यों नहीं बुलाता?

आजकल कुछ लिखने का मन नहीं करता। कोशिश करता हूँ पर या तो नींद आ जाती है या अजीबियत। ठीक - ठीक नहीं पता। किसी दिन यूँ करूँगा कि एक कविता लिखने बैठूँगा उन सभी बातों, किस्सों, ख़्यालों और लोगों के बारे में जिन पर मैं कई-कई नज़्में लिखना चाहता था। 

ब्रह्माण्ड की सबसे ज़्यादा पीड़ कविताओं के हिस्से क्यों आयी ?




Tuesday, 10 February 2026

Conspiracies 

Reminiscences from my diary

Feb 11, 2026
Wednesday 0130 IST 
Murugeshpalya, Bangalore


एक बूँद में कैद समंदर का खारा
करे जतन मेघदूत 
मुस्कराये मछलियाँ 
गुलमोहर टूटे  
पसर जाए बहुत सारा लाल 
क्षितिज पार 
गले में हिचकी अधमरी हूक 
और जुगनू  
कमरे में बंद आसमान 
कैलेंडर से झड़ती तारीखें 
दूब हरी 
राह गुमसुम 
दरवाज़े के की-होल में गड़ी आँख 
जंगल में आग 
धीमे-धीमे जलता दिन 
धीमे-धीमे सुलगती रात 

Saturday, 7 February 2026

Delhi 2010

Reminiscences from my diary

February 07, 2026
Saturday 2230 IST
Murugeshpalya, Bangalore


ट्रेन की खिड़की पर टंगी आँखें 
आँखों में टंका दाँत के ऊपर दाँत 

पूस की रात, वसंत की साँझ, 
जेठ की दोपहरी, बरसात की ताक 

सूरज के कभी होने, कभी न होने की कुढ़न 
और रोज़ रात चाँद तक बनते पुल 

सफ़ेद कोट, नीली टोपी, मेट्रो का काँच 
काँच के बाहर पसरा रोमांच 

विष्णु, मृत्युंजय और रंग-बिरंगी रोशनियाँ 
काँधे पर कुछ टिकी, कुछ झूलती नींद  

सिनेमा, संगीत, हिमेश, लता और  
गीता के पाठ 

आसमान में उठते-उड़ते मन
मन में मन-मन भर बौराहट  

उँगलियों में सिमटता अधजगा शहर 
चुटकियों में बीत रहे कई-कई पहर 

कितने सफ़र, कितनी बातें, 
कितने रतजगे, कितने ठहाके 

एक थी दिल्ली २०१०, और
एक था तुम्हारा जन्मदिन 

Saturday, 10 January 2026

Heartlessness

Reminiscences from my diary

Jan 10, 2026
Saturday, 2230 IST
Murugeshpalya, Bangalore

अक्षरधाम से गुज़रती मेट्रो में उठता है 
सबसे ज़्यादा दर्द 
बार-बार, हर बार 

वक़्त भर ही देता होगा 
हर ज़ख्म और हर याद 
दोनों की तासीर एक

पानी से तर यादें
पीड़ से रिसता मवाद  
नमक ही नमक,  चुप ही चुप   

समंदर तबाह, आसमान भी  
लहूलुहान रेशा-रेशा 
बेदर्दों का कुछ नहीं जाता 

Monday, 5 January 2026

Himalayas yet again!

Reminiscences from my diary

Jan 05, 2026
Monday 2215 IST 
Murugeshpalya, Bangalore


दिन - १ 
कल मैं फिर से रानीखेत में होने वाला हूँ, माँ कालिका का छोटा-सा मंदिर घूम रहा आँखों में।  थोड़ी ख़ुमारी, थोड़ी नींद  ... 

दिन २ 
काठगोदाम आ गया है। बस अब थोड़ी देर में चीड़ दिखने शुरू हो जायेंगे, फिर कैंची धाम की भीड़, फिर और चीड़, और चीड़, और निर्मल की याद। रात ही न हो जाए पहुँचते - पहुँचते  ...

दिन ३ 
मेरे बिस्तर से ही घाटी दिखती है, और उसमें टिमटिमाती, बिखरी-बिखराई रोशनियाँ - यह कितनी सही बात हुई। अच्छा है कमरा, पर तारा की याद अब भी हावी है। साँस में साँस आ रही है। काली माँ मुस्कुरा रही हैं। 

दिन ४ 
खूबसूरत खिड़की, कोसी धूप और मचलती परछाइयों का खेल। एक सीधी - सादी तस्वीर  ... 
शनि, चाँद, कपिला, और गुरु बृहस्पति - जादू, माया, तिलिस्म  ... 

दिन ५ 
देख ही लिया पंत-म्युज़ियम। और उनका घर।  सरकार रेनोवेट कर रही है। नहीं जानता था तीन बातें - उनके जन्म के छः घंटे बाद उनकी माँ का देहांत, उनका आजीवन विवाह न करना, और यह कि इंकलाब बच्चन को अमिताभ बच्चन बनाने का श्रेय पंत जी को जाता है। 

दिन ६ 
बैजनाथ, फिर से  ... बागेश्वर फिर से  ... मुंसियारी पहली बार  ... 
बागेश्वर जैसी जलेबियाँ मिल जाएँ तो कहना  ... 

दिन ७ 
नैना देवी, चारों ओर पसरी सुन्दर धूप, धूप सकते पहाड़, और मैं  ... 
देवराज की बातें, शरारतें, सामने ठन्डे पानी का झरना, और सल्फर के गरम पानी में डूबा मैं  ... 

दिन ८ 
मुंसियारी के गाँव, गोलू देवता को लिखे ख़त, ख़तों को सहेजती हज़ारों-लाखों घंटियाँ, और फिर कसार देवी से मिलना। नहीं जानता था कि स्वामी विवेकानंद ने अपना तेज यहीं पाया था। 
नीचे उतारते हुए अल्मोड़ा घाटी की टिमटिमाहट को एक बार फिर आँखों से पीना  ... 

दिन ९ 
अट्ठारह किलोमीटर की वॉक ! बहुत सुन्दर, खुशनुमा दिन, और तेरह किताबें  ... 

दिन १० 
मझखाली की धूप, पोहे, और किताब  ... 
चन्दन भैया की चाय, बन-मस्का और किताब  ...  
बातुली अका की टिक्की, मोमो, और किताब  ... 
आनंद जी का अल्पाइन, लेमन टी, और किताब  ... 

दिन ११ 
नौ घंटे का सफ़र, मन में मुसमुसाहट, और ढेर सारी अजीबियत। कुछ देर और -  और फिर घर !