Saturday, 18 July 2026

I want to be a teacher

Reminiscences from my diary

July 18, 2026
Saturday 1445 IST
Murugeshpalya, Bangalore


मैं मीलों मील अपने साथ पाँव-पाँव चल सकता हूँ 
अल्मोड़ा के पहाड़ों से चीड़ चुनता हूँ 
प्रशांत में पाँव पखारता हूँ
सोहरा में बारिश चखता हूँ 
पारिजात, मोगरा और कनेर सराह सकता हूँ 
तुलसी, पुदीना और अजवायन में भेद कर सकता हूँ 
शफ़ाक़ और शिवानी को पढ़कर रो पड़ता हूँ 
इशिगुरो को पढ़ते पढ़ते भटक जाता हूँ 
अमृता की चिट्ठियों से प्रेम समझने का प्रयास करता हूँ 
हुसैन और शेरगिल की पेंटिंग्स देर देर ताकता हूँ 
अरविन्द की इमली के नीचे घंटों मौन साध सकता हूँ 

एक व्यस्त नौकरी के साथ साथ अगर ये सब कर सकता हूँ या कर पाया हूँ तो बस इसलिए कि मुझे मेरे गुरुओं ने जीवन के, पृथ्वी के, और एक मानव होने के विभिन्न आयामों के बारे में बेहद सुंदरता से अवगत कराया ! रोम-रोम में स्कूल बसा है मेरा, रोम-रोम में अपने गुरुओं के प्रति धन्यवाद, ईश्वर के प्रति आभार! 

प्रभाव इतना गहन कि बचपन से ही कोई पूछता कि क्या बनना चाहते हो, मैं तपाक से कहता - टीचर ! एक सपना जो जिजीविषा में घुला हुआ है ! सहारनपुर में स्कूल के १२ वर्ष, पटिआला में चार साल स्नातक, भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर से स्नातकोत्तर, १३ साल एक बैंकर की नौकरी, हॉन्ग कॉन्ग, जापान, लंदन, या अमेरिका - जहाँ भी गया, जहाँ भी रहा  - सपना पकता रहा शिद्दत से, कभी कभी बेचैनी से भी  - साल दर साल, उम्र दर उम्र !

पापा ने नहीं चाहा मैं पढ़ाऊँ  - समझाया, बुझाया पर उन्हें मना नहीं पाया ! बावजूद इसके अपनी तरफ से जितनी कोशिश कर सकता था उतनी की - शुरुआत की सहारनपुर से - अपने एल्मा मेटर में २ महीने पढ़ाकर ! तीन साल कॉलेज में नॉन टीचिंग स्टाफ के बच्चों को पढ़ाया, एक ट्यूशन-कम-स्कूल जैसा सिस्टम तैयार किया, बैंगलोर आकर ३ साल 'करियर लांचर' में विधि और प्रबंधन की कोचिंग लेते विद्यार्थियों को पढ़ाया, फिर ९ साल माउंट कार्मेल कॉलेज में बतौर गेस्ट फैकल्टी पढ़ाया ! स्वयं को जिस हद तक भी एक अध्यापक होने के करीब रख सकता था, उतना रखा ! और इस बात की बहुत ख़ुशी, बहुत सुकून, बहुत गर्व भी है !

अब चाहता हूँ, जीवन में अगले पड़ाव पर पहुँचूँ ! पूरी तरह से टीचर बनूँ! अपने गुरुओं से, किताबों से, जीवन से, अनुभवों से जो सीखा है उसे नयी पीढ़ी के साथ साझा करूँ ! कोशिश करूँ एक ऐसा शिक्षक बनने की जो किसी जिज्ञासु को अंतर्यात्रा के लिए प्रेरित कर सके क्योंकि अभी भी आशा है कि  ए आई और जिम वाली दुनिया में शिक्षक सहेज पाएँ मनुष्य होने की लौ !


I could walk miles at ease with myself.
I could gather pine cones from the hills of Almora.
I could dip my feet in the Pacific.
I could taste the rains of Sohra.
I could admire the parijat, mogra, and kaner in bloom.
I could tell tulsi, mint, and ajwain apart by scent alone.
I could weep reading Shafaq and Shivani.
I could lose myself wandering through Ishiguro.
I could appreciate love through Amrita's letters.
I could stand for hours before a Husain or a Sher-Gil.
I could sit in silence for hours under Arvind's tamarind tree.

This is the range of being human my teachers opened me to — and it is this range I now want to open in others. If I have held onto all this alongside a demanding career, it is only because my teachers introduced me — with care — to the many dimensions of life, of this earth, and of being human. My school lives in every fibre of my being; in every fibre, I carry gratitude for my teachers, and thankfulness to whatever higher force there is.

The influence ran so deep that, from childhood, whenever anyone asked what I wanted to become, I answered without hesitation: a teacher. It was a dream fused with my will to live. Twelve years of school in Saharanpur shaped the foundation; four years of undergraduate study in Patiala and a postgraduate degree from the Indian Institute of Science, Bangalore, shaped the discipline. Then came thirteen years as a banker at Goldman Sachs — in Hong Kong, Japan, London, the United States — wherever I went, the dream kept ripening: sometimes quietly, sometimes restlessly, year after year.

My father did not want me to teach. He reasoned with me, tried to dissuade me — but I could not be dissuaded either. So I did what I could on my own terms: two months teaching at my alma mater in Saharanpur; three years teaching the children of non-teaching college staff, building a small tuition-cum-school system; three years teaching law and management aspirants at Career Launcher, Bangalore; nine years as guest faculty at Mount Carmel College. I kept myself as close to being a teacher as circumstances allowed — and that has given me deep joy, deep peace, deep pride.

Now I want to take the next step: to become a teacher fully and completely, in the spirit this Foundation holds dear — not to fill young minds with answers, but to walk alongside them as they question, observe, and come to know themselves. Whether through literature, statistics, or the social sciences, I want to teach not as one who has arrived, but still on the way — using the classroom itself as a place to continue my own inward journey even as I help a curious mind find hers. I still hold the hope that even in a world of AI and gyms, teachers who truly pay attention can help human beings stay in touch with the flame of their own humanity — mine included.



 

Saturday, 11 July 2026

Love Love All Around!


Reminiscences from my diary

July 11, 2026
Saturday 2145 IST
Murugeshpalya, Bangalore


मैंने 
इस पृथ्वी के 
सबसे सुन्दर व्यक्ति से प्रेम किया 

इस संसार में 
हर किसी का प्रेमी उसके लिए 
सबसे सुन्दर व्यक्ति होता है 

ईश्वर करे इस ब्रह्माण्ड में 
हर व्यक्ति किसी न किसी के लिए 
सबसे सुन्दर हो !

Thursday, 25 June 2026

Tibet Diaries : Day 5

Reminiscences from my diary

June 25, 2026
Thursday, 2300 HKT
Saga, Tibet

हिमालय के विस्तार को देखकर मैं एक बार फिर हैरान हूँ ! भौचक्का, एकदम! कितने रूप, कितने रंग, कितने पैटर्न! कैसे हो पाया होगा! भूगोल और भौतिकी कुछ भी कहे, ब्रह्मांड की माया के बिना संभव नहीं!
बर्फीले हिमालय, बंजर हिमालय, हरे हिमालय, गहरे हरे हिमालय, ऊँचे हिमालय, नीचे हिमालय, नक्काशीदार हिमालय, सूखे हिमालय, गीले हिमालय पर अंत में :

सुंदर हिमालय 

एवरेस्ट बेस कैम्प को जाती सीधी सपाट सड़क देखी 
ब्रह्नमपुत्र का बचपन देखा 
देखी ल्हासा की उदासी 
और बहुत सारे याक 

ऑक्सीजन का कम होना क्या होता है, पहली बार महसूस किया , अच्छे से महसूस किया! अपूर्वा आंटी ने गले में कपूर की छोटी सी पोटली डाल दी है - उनका कहना है इससे मदद मिलेगी!

४००० मीटर की ऊँचाई पार हो गई है ! कल ४०० किलोमीटर का सफ़र नापना है !

शिव, साथ रहना !

Wednesday, 24 June 2026

Tibet diaries - Day 4

Reminiscences from my diary

June 24, 2026
Wednesday 2230 HKT
Gyoring (somewhere past Tibet border)

धूप 
थकान 
अजीबियत 
हताशा 
निराशा 
हुकूमत 
पहाड़ उदास 
धुंध उदास 
चाँद उदास 

बड़ी सी जेल है तिब्बत 
अगर तिब्बत है तो 

बस इतना ही 
पूर्ण विराम !

Tuesday, 23 June 2026

Tibet diaries : Day 3

Reminiscences from my diary

June 23, 2026
Tuesday, 1930 NST
Somewhere near Tibet border

ये सात घंटे मेरी पहाड़ी यात्राओं का शायद सबसे खतरनाक सफ़र रहा होगा। पूरे रास्ते पर, रास्ते के हर इंच पर भूस्खलनों के बाद का मलबा, पत्थर ही पत्थर, और उन पर डोलती बस हमारी। डगमग डगमग! अब गए कि तब गए ! कोई बैरिकेड नहीं, कोई बचाव नहीं, ज़रा सी गाड़ी इधर उधर हुई नहीं कि सीधा त्रिशूली में, अगर बीच की चट्टानों से बच गए तो! और त्रिशूली - लगभग पूरे रास्ते हमारे साथ साथ चलती रही - पूरे वेग के साथ , पूरे शोर के साथ। काठमांडू से २०० किलोमीटर दूर तिब्बत सीमा जाता नेपाल का यह हिस्सा बहुत रस्टिक है। मुझे याद आता रहा कभी कभी मणिकरण, कभी कभी भूटान ..

छोटा सा गाँव है , सादा सा कमरा ! नीचे त्रिशूली , ऊपर प्रार्थनाओं के झंडे ! उनके पीछे बीच बीच में दिखते पद्मसंभव ! सुनहरे रंग के ! कंधे पर त्रिशूल और उसके दंड पर टिके तीन नरमुंड ! ठंडी तेज़ हवा, ठीक ठाक ऊँचाई, बीच बीच में आती मुस्कुराहट, लता मंगेशकर ..

कुछ जन्म और कुछ दिन - बेतरतीब ही रहते हैं ! समझ से परे! कभी दो कविताएँ, या २३ तस्वीरें, कभी २५ अजीबोगरीब उपहार, और कभी तथागत को टुकुर टुकुर ताकते बस एक मंगलकामना ..

Monday, 22 June 2026

Tibet Diaries : Day 2

Reminiscences from my diary
Monday, June 22, 2026
2200 NST
Kathmandu

मैंने देखा 
कई सौ कबूतरों के बीच बहमाया एक कबूतर सफ़ेद 
और देखे 
बड़े से पीपल के नीचे, कुंड के बीचों बीच,  शेषनाग के अंक में झपकी लेते नारायण
और
हिमालयन जावा कॉफ़ी हाउस में नेपाली टोपी पहने दो खिलखिलाते पुर्तगाली
और 
सोमवार की भीड़ से, हम जैसे लाखों लोगों से शायद परेशान पशुपतिनाथ 
और 
न्यू लुंबिनी भोजनालय के बाहर घुटनों तक बाल बनाती एक लड़की 
और
शिव के लाखों भक्तों की उदासीनता समेटे नदी तट पर एक शांत एकांत शक्तिपीठ 
और
ताज़ा फूलों की कई कई गठरियाँ पीठ पर लादे एक बूढ़ा कुबड़ा 
और
विशालकाय नंदी के पास एक क़तार में बैठी छः भगवा सन्यासिनें 

मैंने देखा 
एक हाथ में बाबुषा की किताब और दूसरे हाथ में ज़ाफ़रानी चाय का सफ़ेद कप लिए काँच के पार न जाने क्या खोजता मैं

Sunday, 21 June 2026

Tibet Diaries : Day 1


Reminiscences from my diary

Sunday, June 21, 2026
2130 Nepal Time
Kathmandu


अलसायी आँखों से नीचे देखा तो देखता ही रह गया। असल में नीचे नहीं, बगल में। पहाड़ साथ साथ से चलते लग रहे थे।सबसे पहले अनुराधा रॉय और उनकी कही बात याद आ गई फिर से , एकदम से। “पहाड़ धरती से उठी लहरें हैं , ऐसी लहरें जो उठीं और बस उठीं ही रह गई , कभी वापस नहीं गईं ।” अब मैं यह सोच रहा हूँ कि उन्होंने यह बात रानीखेत की फ़िज़ा देखकर लिखी थी या फिर मेरी ही तरह तरह काठमांडू जाते जहाज़ की खिड़की से दिखते हिमालय की परतों को देखकर । ख़ैर ..

त्रिभुवन सादा है काफ़ी। और अब तक देखा शहर भी।सादे ही लोग, सादी सड़कें,  सादी गलियाँ, सादे घर, दुकानें, मीनारें। दिन भी सादा, शाम भी, शाम का सन्नाटा भी। - सब कुछ सादा। जान में जान सी आयी। मानो सादगी से मिले मुद्दत बीत गई थी। ख़ैर ..

इश्क़ शर्त के साथ आता है, और शर्त दर्द के साथ। शम्स ने इत्मीनान से इश्क़ तोला और तोलकर बोला कि इस शर्त की रवायत यूँ कि कोई शर्त न हो महबूब से।किसी भी मुक़ाम में नहीं। इस बात के इर्द गिर्द मंडराती पीड़ जो कर पाओ अपनी नसों में शामिल तो सच्चे सूफ़ी कहलाओ! बात बस सुई की चुभन जितनी ही है और यह भी इस चुभन से ही सीना होता है शरीर का, शरीर के अंदर तक का रेशा रेशा ! ख़ैर ..

एक ख़याल से दूसरा ख़याल कब और कैसे दस्तक दे जाता है , कैसे समेटी जा सकती है यादों की पोटली, कैसे सही जाती है जीते जी भुलाए जाने की पीड़ , यह भी ज़रूर किसी दरवेश , सूफ़ी या मौलाना ने बताया होगा , या होगा दफ़न कहीं इन परतों के बीच ! ख़ैर ..

पशुपतिनाथ के पशुपतिनाथ - कल मिलना होगा! तुम्हें देखकर रो ही पड़ूँगा ..