Wednesday, 24 June 2026

Tibet diaries - Day 4

Reminiscences from my diary

June 24, 2026
Wednesday 2230 HKT
Gyoring (somewhere past Tibet border)

धूप 
थकान 
अजीबियत 
हताशा 
निराशा 
हुकूमत 
पहाड़ उदास 
धुंध उदास 
चाँद उदास 

बड़ी सी जेल है तिब्बत 
अगर तिब्बत है तो 

बस इतना ही 
पूर्ण विराम !

Tuesday, 23 June 2026

Tibet diaries : Day 3

Reminiscences from my diary

June 23, 2026
Tuesday, 1930 NST
Somewhere near Tibet border

ये सात घंटे मेरी पहाड़ी यात्राओं का शायद सबसे खतरनाक सफ़र रहा होगा। पूरे रास्ते पर, रास्ते के हर इंच पर भूस्खलनों के बाद का मलबा, पत्थर ही पत्थर, और उन पर डोलती बस हमारी। डगमग डगमग! अब गए कि तब गए ! कोई बैरिकेड नहीं, कोई बचाव नहीं, ज़रा सी गाड़ी इधर उधर हुई नहीं कि सीधा त्रिशूली में, अगर बीच की चट्टानों से बच गए तो! और त्रिशूली - लगभग पूरे रास्ते हमारे साथ साथ चलती रही - पूरे वेग के साथ , पूरे शोर के साथ। काठमांडू से २०० किलोमीटर दूर तिब्बत सीमा जाता नेपाल का यह हिस्सा बहुत रस्टिक है। मुझे याद आता रहा कभी कभी मणिकरण, कभी कभी भूटान ..

छोटा सा गाँव है , सादा सा कमरा ! नीचे त्रिशूली , ऊपर प्रार्थनाओं के झंडे ! उनके पीछे बीच बीच में दिखते पद्मसंभव ! सुनहरे रंग के ! कंधे पर त्रिशूल और उसके दंड पर टिके तीन नरमुंड ! ठंडी तेज़ हवा, ठीक ठाक ऊँचाई, बीच बीच में आती मुस्कुराहट, लता मंगेशकर ..

कुछ जन्म और कुछ दिन - बेतरतीब ही रहते हैं ! समझ से परे! कभी दो कविताएँ, या २३ तस्वीरें, कभी २५ अजीबोगरीब उपहार, और कभी तथागत को टुकुर टुकुर ताकते बस एक मंगलकामना ..

Monday, 22 June 2026

Tibet Diaries : Day 2

Reminiscences from my diary
Monday, June 22, 2026
2200 NST
Kathmandu

मैंने देखा 
कई सौ कबूतरों के बीच बहमाया एक कबूतर सफ़ेद 
और देखे 
बड़े से पीपल के नीचे, कुंड के बीचों बीच,  शेषनाग के अंक में झपकी लेते नारायण
और
हिमालयन जावा कॉफ़ी हाउस में नेपाली टोपी पहने दो खिलखिलाते पुर्तगाली
और 
सोमवार की भीड़ से, हम जैसे लाखों लोगों से शायद परेशान पशुपतिनाथ 
और 
न्यू लुंबिनी भोजनालय के बाहर घुटनों तक बाल बनाती एक लड़की 
और
शिव के लाखों भक्तों की उदासीनता समेटे नदी तट पर एक शांत एकांत शक्तिपीठ 
और
ताज़ा फूलों की कई कई गठरियाँ पीठ पर लादे एक बूढ़ा कुबड़ा 
और
विशालकाय नंदी के पास एक क़तार में बैठी छः भगवा सन्यासिनें 

मैंने देखा 
एक हाथ में बाबुषा की किताब और दूसरे हाथ में ज़ाफ़रानी चाय का सफ़ेद कप लिए काँच के पार न जाने क्या खोजता मैं

Sunday, 21 June 2026

Tibet Diaries : Day 1


Reminiscences from my diary

Sunday, June 21, 2026
2130 Nepal Time
Kathmandu


अलसायी आँखों से नीचे देखा तो देखता ही रह गया। असल में नीचे नहीं, बगल में। पहाड़ साथ साथ से चलते लग रहे थे।सबसे पहले अनुराधा रॉय और उनकी कही बात याद आ गई फिर से , एकदम से। “पहाड़ धरती से उठी लहरें हैं , ऐसी लहरें जो उठीं और बस उठीं ही रह गई , कभी वापस नहीं गईं ।” अब मैं यह सोच रहा हूँ कि उन्होंने यह बात रानीखेत की फ़िज़ा देखकर लिखी थी या फिर मेरी ही तरह तरह काठमांडू जाते जहाज़ की खिड़की से दिखते हिमालय की परतों को देखकर । ख़ैर ..

त्रिभुवन सादा है काफ़ी। और अब तक देखा शहर भी।सादे ही लोग, सादी सड़कें,  सादी गलियाँ, सादे घर, दुकानें, मीनारें। दिन भी सादा, शाम भी, शाम का सन्नाटा भी। - सब कुछ सादा। जान में जान सी आयी। मानो सादगी से मिले मुद्दत बीत गई थी। ख़ैर ..

इश्क़ शर्त के साथ आता है, और शर्त दर्द के साथ। शम्स ने इत्मीनान से इश्क़ तोला और तोलकर बोला कि इस शर्त की रवायत यूँ कि कोई शर्त न हो महबूब से।किसी भी मुक़ाम में नहीं। इस बात के इर्द गिर्द मंडराती पीड़ जो कर पाओ अपनी नसों में शामिल तो सच्चे सूफ़ी कहलाओ! बात बस सुई की चुभन जितनी ही है और यह भी इस चुभन से ही सीना होता है शरीर का, शरीर के अंदर तक का रेशा रेशा ! ख़ैर ..

एक ख़याल से दूसरा ख़याल कब और कैसे दस्तक दे जाता है , कैसे समेटी जा सकती है यादों की पोटली, कैसे सही जाती है जीते जी भुलाए जाने की पीड़ , यह भी ज़रूर किसी दरवेश , सूफ़ी या मौलाना ने बताया होगा , या होगा दफ़न कहीं इन परतों के बीच ! ख़ैर ..

पशुपतिनाथ के पशुपतिनाथ - कल मिलना होगा! तुम्हें देखकर रो ही पड़ूँगा ..

Saturday, 13 June 2026

Evening blues

Reminiscences from my diary

June 23, 2026
Saturday 2015 IST
Menasi, Doddaballarpur



मैं जहाँ हूँ वहाँ कोई नहीं है 
बस
मिट्टी का कच्चा रास्ता है
दोनों ओर टीक के पेड़ हैं 
उनसे पाँच पंखुड़ी वाले छोटे-छोटे हज़ारों सफ़ेद फूल झड़ रहे हैं 
शाम थक चुकी है 
अँधेरा गहराता जा रहा है 
स्ट्रीट लाइट या लैंप पोस्ट जैसी कोई चीज़ नहीं है 
अभी अभी बरसात शुरू हुई है 
गिरती बूँदों की आवाज़ तेज़ होती जा रही है 

और

अचानक से
बिल्कुल अचानक से 
पूरी पगडंडी जुगनुओं से पट गई है

Saturday, 16 May 2026

Randomness yet again

Reminiscences from my diary

May 16, 2026
Saturday, 2245 IST
Murugeshpalya, Bangalore


धीमी-सी भोर धीमी-सी शाम, धीमा-सा मैं धीमा-सा जाम 
प्रशांत पाँव पखारता रहा, मैं सोच-सोच बौराता रहा 
अस्त-व्यस्त रही बाल्कनी, बाल्कनी का सारा हरा 
कुछ ख़्वाब-ख़्वाब कुछ आग-आग, बेमौत मर गया एक तारा 
बीत गया समय बहुत, नहीं जाती बावन चिट्ठियों की ख़ुमारी  
एक सौ चालीस सीढ़ियाँ उतरनी हैं एक घर तक पहुँचने के लिए  
माँ अपनी सहेली के साथ देर तक बतियाती रहती चौखट पर 
एक दिन मिल ही जाएगी नास्तिक की प्रार्थना, साथ में ढेर सारा डोपामाइन 
नहीं लिखना था कुछ फिर भी स्वाहा हुआ एक पन्ना सफ़ेद 
इन हालातों में कैसे जाया जायेगा इस्तानबुल

Sunday, 10 May 2026

Slow acceptance

Reminiscences from my diary

April 29, 2026
Wednesday 0100 AM
Cannon Street, London


तुम्हारा होना
धीमा ज़हर
तुम्हारा न होना
धीमा ज़हर

युग बीत गए
नीलकंठ होते होते