Monday, 22 June 2026

Tibet Diaries : Day 2

Reminiscences from my diary
Monday, June 22, 2026
2200 NST
Kathmandu

मैंने देखा 
कई सौ कबूतरों के बीच बहमाया एक कबूतर सफ़ेद 
और देखे 
बड़े से पीपल के नीचे, कुंड के बीचों बीच,  शेषनाग के अंक में झपकी लेते नारायण
और
हिमालयन जावा कॉफ़ी हाउस में नेपाली टोपी पहने दो खिलखिलाते पुर्तगाली
और 
सोमवार की भीड़ से, हम जैसे लाखों लोगों से शायद परेशान पशुपतिनाथ 
और 
न्यू लुंबिनी भोजनालय के बाहर घुटनों तक बाल बनाती एक लड़की 
और
शिव के लाखों भक्तों की उदासीनता समेटे नदी तट पर एक शांत एकांत शक्तिपीठ 
और
ताज़ा फूलों की कई कई गठरियाँ पीठ पर लादे एक बूढ़ा कुबड़ा 
और
विशालकाय नंदी के पास एक क़तार में बैठी छः भगवा सन्यासिनें 

मैंने देखा 
एक हाथ में बाबुषा की किताब और दूसरे हाथ में ज़ाफ़रानी चाय का सफ़ेद कप लिए काँच के पार न जाने क्या खोजता मैं

Sunday, 21 June 2026

Tibet Diaries : Day 1


Reminiscences from my diary

Sunday, June 21, 2026
2130 Nepal Time
Kathmandu


अलसायी आँखों से नीचे देखा तो देखता ही रह गया। असल में नीचे नहीं, बगल में। पहाड़ साथ साथ से चलते लग रहे थे।सबसे पहले अनुराधा रॉय और उनकी कही बात याद आ गई फिर से , एकदम से। “पहाड़ धरती से उठी लहरें हैं , ऐसी लहरें जो उठीं और बस उठीं ही रह गई , कभी वापस नहीं गईं ।” अब मैं यह सोच रहा हूँ कि उन्होंने यह बात रानीखेत की फ़िज़ा देखकर लिखी थी या फिर मेरी ही तरह तरह काठमांडू जाते जहाज़ की खिड़की से दिखते हिमालय की परतों को देखकर । ख़ैर ..

त्रिभुवन सादा है काफ़ी। और अब तक देखा शहर भी।सादे ही लोग, सादी सड़कें,  सादी गलियाँ, सादे घर, दुकानें, मीनारें। दिन भी सादा, शाम भी, शाम का सन्नाटा भी। - सब कुछ सादा। जान में जान सी आयी। मानो सादगी से मिले मुद्दत बीत गई थी। ख़ैर ..

इश्क़ शर्त के साथ आता है, और शर्त दर्द के साथ। शम्स ने इत्मीनान से इश्क़ तोला और तोलकर बोला कि इस शर्त की रवायत यूँ कि कोई शर्त न हो महबूब से।किसी भी मुक़ाम में नहीं। इस बात के इर्द गिर्द मंडराती पीड़ जो कर पाओ अपनी नसों में शामिल तो सच्चे सूफ़ी कहलाओ! बात बस सुई की चुभन जितनी ही है और यह भी इस चुभन से ही सीना होता है शरीर का, शरीर के अंदर तक का रेशा रेशा ! ख़ैर ..

एक ख़याल से दूसरा ख़याल कब और कैसे दस्तक दे जाता है , कैसे समेटी जा सकती है यादों की पोटली, कैसे सही जाती है जीते जी भुलाए जाने की पीड़ , यह भी ज़रूर किसी दरवेश , सूफ़ी या मौलाना ने बताया होगा , या होगा दफ़न कहीं इन परतों के बीच ! ख़ैर ..

पशुपतिनाथ के पशुपतिनाथ - कल मिलना होगा! तुम्हें देखकर रो ही पड़ूँगा ..

Saturday, 13 June 2026

Evening blues

Reminiscences from my diary

June 23, 2026
Saturday 2015 IST
Menasi, Doddaballarpur



मैं जहाँ हूँ वहाँ कोई नहीं है 
बस
मिट्टी का कच्चा रास्ता है
दोनों ओर टीक के पेड़ हैं 
उनसे पाँच पंखुड़ी वाले छोटे-छोटे हज़ारों सफ़ेद फूल झड़ रहे हैं 
शाम थक चुकी है 
अँधेरा गहराता जा रहा है 
स्ट्रीट लाइट या लैंप पोस्ट जैसी कोई चीज़ नहीं है 
अभी अभी बरसात शुरू हुई है 
गिरती बूँदों की आवाज़ तेज़ होती जा रही है 

और

अचानक से
बिल्कुल अचानक से 
पूरी पगडंडी जुगनुओं से पट गई है

Saturday, 16 May 2026

Randomness yet again

Reminiscences from my diary

May 16, 2026
Saturday, 2245 IST
Murugeshpalya, Bangalore


धीमी-सी भोर धीमी-सी शाम, धीमा-सा मैं धीमा-सा जाम 
प्रशांत पाँव पखारता रहा, मैं सोच-सोच बौराता रहा 
अस्त-व्यस्त रही बाल्कनी, बाल्कनी का सारा हरा 
कुछ ख़्वाब-ख़्वाब कुछ आग-आग, बेमौत मर गया एक तारा 
बीत गया समय बहुत, नहीं जाती बावन चिट्ठियों की ख़ुमारी  
एक सौ चालीस सीढ़ियाँ उतरनी हैं एक घर तक पहुँचने के लिए  
माँ अपनी सहेली के साथ देर तक बतियाती रहती चौखट पर 
एक दिन मिल ही जाएगी नास्तिक की प्रार्थना, साथ में ढेर सारा डोपामाइन 
नहीं लिखना था कुछ फिर भी स्वाहा हुआ एक पन्ना सफ़ेद 
इन हालातों में कैसे जाया जायेगा इस्तानबुल

Sunday, 10 May 2026

Slow acceptance

Reminiscences from my diary

April 29, 2026
Wednesday 0100 AM
Cannon Street, London


तुम्हारा होना
धीमा ज़हर
तुम्हारा न होना
धीमा ज़हर

युग बीत गए
नीलकंठ होते होते

Saturday, 9 May 2026

Distant trains | Moving homes | Dog years

Reminiscences from my diary

April 26, 2026
1230 pm 
Amsterdam


पुराने घर में एक कमरा था
ऊबढ़ खाबड़ सा 
माँ जितनी भी कोशिश करती सवारने - सजाने की
इसकी तासीर न बदलती
अनगढ़ था, अनगढ़ ही रहता

एक पलंग, एक ड्रेसिंग टेबल, एक कानिश, दो आले, 
दस लाल कड़ियाँ, 
कड़ियों से जब - तब झड़ता पत्थर - चूने का मलबा,
दो अलमारियाँ, अलमारियों पर सीमेंट के धब्बे, 
सीलन से फूली दीवारें और उतरता पलस्तर

इस थके थके, धीरे धीरे साँस भरते कमरे में 
एक खिड़की टंगी थी 
हरे से रंग की 
पीछे एक संकरी गली में खुलती थी
इतनी संकरी
कि एक समय में दो व्यक्ति से ज़्यादा न गुज़र पाएँ

मैं 
सर्दी के दिनों में 
इस खिड़की के पास कुर्सी मेज़ लगा लेता 
और देर रात तक पढ़ाई करने की कोशिश करता 

हिंदी फ़िल्मी गानों का बेहिसाब शौक रखने वाला मैं
अक्सर इस फ़टी कुर्सी पर बैठा, 
माँ के शॉल में लिपटा 
हिलती - डुलती मेज़ पर कोहनी टिकाए, 
सामने किताब खोले, रेडियो की तमन्ना करता हुआ
खुद को गुनगुनाता हुआ पाता

पूस की इन ठिठुरती सुनसान 
और कभी कभी सीली रातों में 
चार चाँद तब लगते 
जब
तीन किलोमीटर दूर स्टेशन से 
कोई रेलगाड़ी गुज़रती
कभी धीरे धीरे हॉर्न बजाती हुई
तो कभी 
दनादन पटरियाँ थरथराती हुई

मुझे यूँ लगता जैसे किसी ने 
अचानक 
मेरे आस पास 
सुलगा दिए हों आँच के अलाव

कभी कभी घर बदलने से खिड़कियाँ नहीं बदलतीं

Wednesday, 15 April 2026

Bruised blue | Survival instinct | Circling back | Waiting room

Reminiscences from my diary

Apr 15, 2026
Wednesday 2350 IST
Murugeshpalya, Bangalore


विष बैठाया कंठ में
पाया नया नाम 
तुम्हीं बताओ, मृत्युंजय, 
क्या कहें उनको 
मन-वच-काय पर हों जिनके 
नील ही नील 

यह भी भेद बताओ 
कि कोई कैसे सींचे साँस 
जब रखा हो छाती पर 
पूरा का पूरा हिमालय 
क्या कहें उनको जो पहाड़ ढोते- ढोते 
हो जाएँ खुद पहाड़

पत्थर टूटे तो वापस 
नदी में हिलमिल जाता है 
तुम भी तो जब तब 
कैलाश लौट जाते हो 
तो फिर यूँ करो कि कह दो अस्तु और 
हर यायावर को मिल जाए अपना एक घर 

सुनो, एक वर और दो फिर 
कि घर मिले तो घर में मिले 
एक आँगन, एक वट 
एक बेलपत्र, ढेर सारे रुद्राक्ष 
और कभी ऐनक, कभी बिना ऐनक 
मेरी राह तकते टुकुर- टुकुर दो नयन