Saturday, 10 January 2026

Heartlessness

Reminiscences from my diary

Jan 10, 2026
Saturday, 2230 IST
Murugeshpalya, Bangalore

अक्षरधाम से गुज़रती मेट्रो में उठता है 
सबसे ज़्यादा दर्द 
बार-बार, हर बार 

वक़्त भर ही देता होगा 
हर ज़ख्म और हर याद 
दोनों की तासीर एक

पानी से तर यादें
पीड़ से रिसता मवाद  
नमक ही नमक,  चुप ही चुप   

समंदर तबाह, आसमान भी  
लहूलुहान रेशा-रेशा 
बेदर्दों का कुछ नहीं जाता 

Monday, 5 January 2026

Himalayas yet again!

Reminiscences from my diary

Jan 05, 2026
Monday 2215 IST 
Murugeshpalya, Bangalore


दिन - १ 
कल मैं फिर से रानीखेत में होने वाला हूँ, माँ कालिका का छोटा-सा मंदिर घूम रहा आँखों में।  थोड़ी ख़ुमारी, थोड़ी नींद  ... 

दिन २ 
काठगोदाम आ गया है। बस अब थोड़ी देर में चीड़ दिखने शुरू हो जायेंगे, फिर कैंची धाम की भीड़, फिर और चीड़, और चीड़, और निर्मल की याद। रात ही न हो जाए पहुँचते - पहुँचते  ...

दिन ३ 
मेरे बिस्तर से ही घाटी दिखती है, और उसमें टिमटिमाती, बिखरी-बिखराई रोशनियाँ - यह कितनी सही बात हुई। अच्छा है कमरा, पर तारा की याद अब भी हावी है। साँस में साँस आ रही है। काली माँ मुस्कुरा रही हैं। 

दिन ४ 
खूबसूरत खिड़की, कोसी धूप और मचलती परछाइयों का खेल। एक सीधी - सादी तस्वीर  ... 
शनि, चाँद, कपिला, और गुरु बृहस्पति - जादू, माया, तिलिस्म  ... 

दिन ५ 
देख ही लिया पंत-म्युज़ियम। और उनका घर।  सरकार रेनोवेट कर रही है। नहीं जानता था तीन बातें - उनके जन्म के छः घंटे बाद उनकी माँ का देहांत, उनका आजीवन विवाह न करना, और यह कि इंकलाब बच्चन को अमिताभ बच्चन बनाने का श्रेय पंत जी को जाता है। 

दिन ६ 
बैजनाथ, फिर से  ... बागेश्वर फिर से  ... मुंसियारी पहली बार  ... 
बागेश्वर जैसी जलेबियाँ मिल जाएँ तो कहना  ... 

दिन ७ 
नैना देवी, चारों ओर पसरी सुन्दर धूप, धूप सकते पहाड़, और मैं  ... 
देवराज की बातें, शरारतें, सामने ठन्डे पानी का झरना, और सल्फर के गरम पानी में डूबा मैं  ... 

दिन ८ 
मुंसियारी के गाँव, गोलू देवता को लिखे ख़त, ख़तों को सहेजती हज़ारों-लाखों घंटियाँ, और फिर कसार देवी से मिलना। नहीं जानता था कि स्वामी विवेकानंद ने अपना तेज यहीं पाया था। 
नीचे उतारते हुए अल्मोड़ा घाटी की टिमटिमाहट को एक बार फिर आँखों से पीना  ... 

दिन ९ 
अट्ठारह किलोमीटर की वॉक ! बहुत सुन्दर, खुशनुमा दिन, और तेरह किताबें  ... 

दिन १० 
मझखाली की धूप, पोहे, और किताब  ... 
चन्दन भैया की चाय, बन-मस्का और किताब  ...  
बातुली अका की टिक्की, मोमो, और किताब  ... 
आनंद जी का अल्पाइन, लेमन टी, और किताब  ... 

दिन ११ 
नौ घंटे का सफ़र, मन में मुसमुसाहट, और ढेर सारी अजीबियत। कुछ देर और -  और फिर घर !



Monday, 22 December 2025

Silence translated 

Reminiscences from my diary

Dec 22, 2025
Monday 2045 IST
Murugeshpalya, Bangalore


जेरेनियम के फूल उगते हैं - एक, दो, तीन, गुच्छे के गुच्छे, कई कई रंगों के, 
फिर एक दिन उड़ जाते हैं - पंखुड़ी - पंखुड़ी, धीरे - धीरे, चुपचाप 
कोई नहीं जान पाता
न मैं, न ओस, न आस-पास रहतीं मकड़ियाँ 

बहुत सारे पोस्टकार्ड्स, बहुत सारे बुकमार्क्स 
एक कविता से दूसरी कविता, एक  किरदार से दूसरा किरदार  
मौसम-मौसम, दुनिया-दुनिया, निशान-निशान 
इतनी छलाँगे और एक चूँ तक नहीं 

तथागत की मुस्कान, फटी तस्वीर से झाँकते नानक
सफ़ेद पोशाक में नाचता दरवेश  
तीन नीले कुशन 
एक मोमबत्ती खुशबूदार 

ऐक्रेलिक में कैद पानी, पानी में कैद मछलियाँ 
एक से दस नंबर के पंद्रह पेंटब्रश 
धूल, रंग, रंगों से सने नाखून 
कुछ खाली फ्रेम 

पोर्सिलेन का मग, मग पर हिमालय, हिमालय पर गिरती धूप
कांच से झाँकता बुराँश  
मिटटी के कुछ दीये 
हरे काँच का एक कछुआ 

माँ के दिए बर्तन
लौंग, हींग, शहद, नमक 
रसोई की खुली खिड़की 
खिड़की से झाँकती आँखें दो  

जो अब नहीं हैं, उनकी चिट्ठियाँ, उनके दस्तख़त 
दो फोटो एल्बम, एक बुशर्ट, बुशर्ट का आधा बटन
सूखे महँगे पेन, पुरानी डायरियाँ, कैलेंडर 
ग्रीटिंग कार्ड्स 

तुम  सच कहीं थीं बाबुषा 
दुनिया में सबसे ज़्यादा अनुवाद मौन का हुआ है 





Sunday, 21 December 2025

Forgiveness

Reminiscences from my diary

Dec 21, 2025
Sunday 2100 IST
Murugeshpalya, Bangalore


ढेर सारी 

घृणा
और आक्रोश 
और द्वन्द 
और द्वेष 

और अचम्भा भी 
और सीमाएँ
और असत्य 
और अप्रेम 

ढेरों ढेर 
बहुत सारी 

इच्छाएँ 
और निराशाएँ 
और घाव 
और नील

और 

घुटन घुटनों तक 
कसक नाखूनों भर 
रोम - रम रूदन 
फिर निस्पंदन 

रह गयी अंत में 

अंजुलि भर 

क्षमा 


 

Thursday, 27 November 2025

Existence

Reminiscences from my diary

Nov 27, 2025
Thursday 2030 IST 
Murugeshpalya, Bangalore


मासूम था मैं
तुम्हारे न होने में 
तुम्हारे होने को ढूँढता रहा 

बात महज़ इतनी-सी थी कि  
तुम्हारा होना 
नहीं था तुम्हारा होना

समझता रहा
मेरा होना है 
तुम्हारा होना 

और यह भी कि 
तुम्हारा न होना है 
मेरा न होना 

अब जब बरस बीते तो बूझ पाया
नियति है तुम्हारा न होना
मेरा होना 

और इस तरह हुआ 
मेरा होना
मेरा ही न होना 

Sunday, 23 November 2025

I tried everything..

Reminiscences from my diary

NOv 23, 2025
Sunday 2230 IST
Murugeshpalya, Bangalore

तस्वीरें चूमीं
लगाई रखीं छाती से 
कई देवताओं के आगे
लगाया ध्यान 
पहाड़ों से माँगा सब्र
खोजा सुकून समन्दरों में 
मीलों चला जंगलों में, शहरों में,
सुनसान अंधेरों में 
सूरज निचोड़ा, चाँद फूँका, 
पूर्वजों से माँगी मन्नतें 
बादल चखे, बारिशें पी, 
रेशा - रेशा किया धुआँ 
पोस्टकार्ड भेजे, चिट्ठियाँ लिखीं, 
नाखूनों में छिपाया नाम 
किताबों में ढूँढी साँस, 
मौन में बाँधा शोर 
पहले खुला, फिर उधड़ा, 
फिर हुआ ज़ार-जार, लहूलुहान

ख़लील होना तो बहुत बड़ी बात थी, 
तुम्हें तो एक कतरा तरस भी न आया 



Thursday, 20 November 2025

I turned into a story

Reminiscences from my diary

Nov 20, 2025
Thursday 2245 IST
Murugeshpalya, Bangalore


... कि और कुछ नहीं तो 
कमसकम एक कहानी
एक किस्सा तो बनेगा 
सुनने - सुनाने को 

जिसकी शुरुआत कुछ यूँ होगी कि 

एक बार की बात है 
नाम तो ठीक - ठीक नहीं याद
न ही चेहरा पूरा
बस इतना कि 
फलाँ इंसान को 
फलाँ मौसम फलाँ तारीख़ 
बैठे-बैठे, गाहे - बगाहे 
हुई थी टूटकर मोहब्बत ...