Rejection Letter | Empty Chair | Invisible String | Desert Snail
Reminiscences from my diary
April 11, 2026
Saturday 0230 IST
Murugeshpalya, Bangalore
तुम्हारी हर कुनमुनाहट को
मैंने बेहद तसल्ली से पढ़ा
कई बार पढ़ा, बार-बार पढ़ा
फिर करीने से काग़ज़ मोड़ा, और
होंठ की पपड़ियों में अटकी नमी से
लिफ़ाफ़ा वापिस चिपका दिया
बड़े कमरे के एक कोने में
रोज़मैरी की गंध लिए
एक खाली कुर्सी रहती है
घर की अभिन्न सदस्य सरीखी
तुम्हारे लिखे सारे ख़तों से
मेरा घर, मेरा मन और यह कुर्सी - सब आबाद हैं
मैंने इंतज़ार किया मौसमों का, चिट्ठियों का भी
तासीर और तड़प एक ही रही
मानो मेरे ही रेशे-रेशे से बुनता
कोई मकड़जाल
अपने ही धागों से सुलझा-सुलझा सा
अपने ही धागों में उलझा-उलझा सा
जब-जब तुम्हें लिखने बैठा
बेतरतीबी बेताल-सी हावी रही
और एक बेचैनी, जैसे -
आँख में गिर गई हो किरकिरी
हथेली में भर आयी हो अमावस
या मचलता हो रीढ़ पर केंचुआ कोई
No comments:
Post a Comment