Monday, 14 September 2026

शुभ हिंदी दिवस 

Reminiscences from my diary

Sep 14, 2026
Monday 2130 IST
Murugeshpalya, Bangalore


बारह साल के मन के लिए एक नयी तरह का रोमांच था बाबा नागार्जुन की कविता से रूबरू होना। हिमालय, चकवा-चकवी, कुबेर, अलका, मेघदूत, कालिदास, हंस, किन्नरों के गाँव, देवदार, कस्तूरी, मानसरोवर, कैलाश - सब कुछ तो पिरो दिया था बाबा ने पाँच पदों में - मैं हैरान, बहुत बहुत हैरान - बस बार-बार पढता रहता, गुनगुनाता रहता - न शब्दों के मायने ठीक से पता थे, न उनका भूगोल, न ही यहाँ-वहाँ बिखरी हुई किंवदन्तियाँ। किसे पता था कि पराग के दो पन्ने एक भाषा के प्रति एक शांत, सौम्य प्रेम जगा रहे थे, एक ऐसी भाषा जिसने फूँकी साँस में साँस, एक ऐसी दुनिया जिसकी चौखट टकरा गई थी पाँव के अंगूठे से, हथेली में भर आई थी साँकल  .. 

.. दरवाज़ा खटखटाया ही था कि दूसरी ओर से एक आहट आई, मानो कोई मेरी ही राह तक रहा था बहुत देर से, बहुत दूर से। यूँ आई शिवानी मेरे जीवन में, और उनकी कृष्णकली, और अल्मोड़ा, और कौसानी, और रानीखेत, और रानीखेत को सजाते त्रिशूल, चौखम्बा, चिताई महाराज। सोचता हूँ, अगर सुनीता मैम मदद न करतीं तो क्या महज़ पंद्रह बरस का मैं मिल पाता कली से, चंपा से, भैरवी से, सुरंगमा से, शिवानी से। हिंदी उपन्यासों का एक ऐसा सुखद संसार जो मेरी शामों में, रतजगों में कुछ यूँ हिल-मिल गया कि मेरा होना मुकम्मल कर गया। मैं आज तक नहीं ढूँढ पाया ऐसे शब्द जो ठीक-ठीक व्यक्त कर दें मेरे मन की सारी कृतज्ञता - शिवानी के लिए, सुनीता मैम के लिए  .. 

.. फिर कुछ सालों बाद आई जेठ की एक दोपहर, सौ साल पुराने पेड़ों से घिरी एक लाइब्रेरी, धूप-छाँव का खेल, और आँखों में ढेर सारी चुप्पी भरे मैं। पता नहीं क्या सूझा था उस एक पल कि स्टेटिस्टिक्स पढ़ते-पढ़ते मैं ढूँढने लगा था बुक-शेल्व्ज़ में हिंदी की कोई किताब। पता नहीं समय के उस एक आयाम में मैंने अमृता को पाया या अमृता ने मुझे। मैंने देखा है कि अक्सर लोग अमृता को इसलिए जानते हैं क्योंकि वे साहिर को जानते हैं। पर मैं पहले अमृता से मिला, औरों से बाद में। उस एक पल, उस एक पतली सी किताब में जो पढ़ा, पढता ही रह गया - कोई कितनी आसानी से दर्द को, बिरहा को उकेर सकता है और फिर भी जी सकता है, यह मैंने पहली बार तब देखा। नज़्मों का, गुफ़्तगू का दौर जो शुरू हुआ तब, आज तक कायम है। यूँ ही रसीदी टिकट मेरे सफ़रों की हमसफ़र नहीं है।  

आजकल कम लिखना होता है। कोई वजह नहीं है, बस शायद एक अजीबोगरीब उदासीनता जो अब-कब धमक पड़ती है। पर फिर मेरे पास मेरी किताबें हैं, नागार्जुन हैं, शिवानी हैं, अमृता हैं, कवितायें हैं, उपन्यास हैं, डायरियाँ हैं - घर के अभिन्न सदस्य सरीखी। इन सबसे अपनी शामें ढालता रहता हूँ और उदासीनता छिप जाती है घर के किसी कोने में फिर कभी लौटकर आने के लिए।  कितनी ही दुनियाएँ खोने के लिए, डूबने के लिए।  उन सभी दुनियाओं के लिए, किरदारों के लिए, कहानियों के लिए, शब्दों के लिए, हिंदी के लिए - ढेर सारा प्यार, ढेर सारा धन्यवाद।