Sunday, 21 June 2026

Tibet : Day 1


Reminiscences from my diary

Sunday, June 21, 2026
2130 Nepal Time
Kathmandu


अलसायी आँखों से नीचे देखा तो देखता ही रह गया। असल में नीचे नहीं, बगल में। पहाड़ साथ साथ से चलते लग रहे थे।सबसे पहले अनुराधा रॉय और उनकी कही बात याद आ गई फिर से , एकदम से। “पहाड़ धरती से उठी लहरें हैं , ऐसी लहरें जो उठीं और बस उठीं ही रह गई , कभी वापस नहीं गईं ।” अब मैं यह सोच रहा हूँ कि उन्होंने यह बात रानीखेत की फ़िज़ा देखकर लिखी थी या फिर मेरी ही तरह तरह काठमांडू जाते जहाज़ की खिड़की से दिखते हिमालय की परतों को देखकर । ख़ैर ..

त्रिभुवन सादा है काफ़ी। और अब तक देखा शहर भी।सादे ही लोग, सादी सड़कें,  सादी गलियाँ, सादे घर, दुकानें, मीनारें। दिन भी सादा, शाम भी, शाम का सन्नाटा भी। - सब कुछ सादा। जान में जान सी आयी। मानो सादगी से मिले मुद्दत बीत गई थी। ख़ैर ..

इश्क़ शर्त के साथ आता है, और शर्त दर्द के साथ। शम्स ने इत्मीनान से इश्क़ तोला और तोलकर बोला कि इस शर्त की रवायत यूँ कि कोई शर्त न हो महबूब से।किसी भी मुक़ाम में नहीं। इस बात के इर्द गिर्द मंडराती पीड़ जो कर पाओ अपनी नसों में शामिल तो सच्चे सूफ़ी कहलाओ! बात बस सुई की चुभन जितनी ही है और यह भी इस चुभन से ही सीना होता है शरीर का, शरीर के अंदर तक का रेशा रेशा ! ख़ैर ..

एक ख़याल से दूसरा ख़याल कब और कैसे दस्तक दे जाता है , कैसे समेटी जा सकती है यादों की पोटली, कैसे सही जाती है जीते जी भुलाए जाने की पीड़ , यह भी ज़रूर किसी दरवेश , सूफ़ी या मौलाना ने बताया होगा , या होगा दफ़न कहीं इन परतों के बीच ! ख़ैर ..

पशुपतिनाथ के पशुपतिनाथ - कल मिलना होगा! तुम्हें देखकर रो ही पड़ूँगा ..

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