Another evening, ordinary
Reminiscences from my diary
Saturday, Aug 29, 2026
2230 IST
Murugeshpalya, Bangalore
दोपहर अलसाई सी
आँख यूँ लगी कि सीधा
छः बजे खुली
ग़फ़लत, साँझ का सियाह
और बाहर गिरता मेंह
कुछ देर और बिस्तर पर पड़ा रहा
माँ को फ़ोन मिलाया
टूटा शरीर समेटा, उठा -
कमरे, मंदिर, रसोई की बत्तियाँ जलायीं
दीया बाती की, फिर शिव का जप
आँखें मूंदे रखीं कुछ देर और
कपूर की धुनी, धुनी का धुआँ, धुएँ में प्रेत
जब तक चाय उबलती रही
चलता रहा लूप में मेरे हमनफ़स, मेरे हमनवाज़
कुछ देर खुशवंत सिंह की दिल्ली पढ़ी
व्हाट्सऐप की प्रोफाइल पिक्चर बदली
तिब्बत का चाँद टंकाया
रूमी को याद किया
सैर को निकला, निकलते ही आसमान में देखा
आँखें ढूँढ़ने लगीं कुछ
बादल ही बादल काले घने
गुलमोहर से पटा चोरस
चोरस को तीन बार नाप चुका था कि
अचानक से आसमान में दिखा
उजला, गोल, सघन सफ़ेद
बादलों को छिटकता
नज़र का टीका लगाए पूरा चाँद
मैं मुस्काया
कुनमुनाया
शरमाया
और जितना भी हो पाया
आँखों में भर
अपने घर लौट आया
अब इस एक पहर
मेरी बालकनी, मेरा कमरा, मेरा मन
सब रोशन हैं
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