Friday, 28 December 2018

Three-piece certitude...


Reminiscences from my diary
Dec 28, 2018
08:15 pm
Murugeshpalya, Bangalore


तीन बातें हैं  ...

पहली बात -
तुम्हें मुझसे कुछ शिकायतें हैं और -
मुझे तुमसे !

दूसरी बात -
तुम्हें मेरी शिकायतें पता है और -
मुझे तुम्हारी !

तीसरी और आखिरी बात -
एक - सी नहीं हैं तुम्हारी और मेरी -
शिकायतें !

Wednesday, 26 December 2018

Odds of a December afternoon


Reminiscences from my diary
Dec 26, 2018 03: 30 PM
GS,  CD,  Bangalore

तुम्हारा मेरे पास आना -
मुझसे मिलना, मेरे साथ -
वक़्त गुज़ारना, हँसना, बतियाना, सकुचाना -
यह सब मेरे लिए 'शायद' था !
कल्पनाओं - सा शायद !
मिथ्याओं - सा, मिथकों - सा शायद !
अधजगी रात के अधपके सपने - सा शायद !
यह शायद यकीन बने - चाहा हमेशा था, पर -
यह शायद यकीन बनेगा - माना कभी नहीं था !

... पर फिर एक दिन आया !
किसी भटकती आकाश गंगा के
भटकते पिंड - सा
एक कायनाती दिन !
टूटी खिड़की की जंग लगी जाली से घुसता
भोर की धूप के टुकड़े - सा
एक उजला दिन !
कल्पों से मेंह की राह तकते
बंजर मरु को मुक्ति देता
सलिल से सीला दिन !

... उस दिन,
तुम वाकई मेरे पास आए -
मुझसे मिले, मेरे साथ -
वक़्त गुज़ारा, हँसे, बतियाए, सकुचाए ...!
उस दिन -
तुम 'शायद' नहीं, यकीनन एक यकीन थे !

मानो या न मानो -
उस दिन, मैंने -
हर नक्षत्र -
हर गंगा -
हर शिव से प्रार्थना की थी कि -
दिन थोड़ा ठहर जाए -
वक़्त थोड़ा ठहर जाए -
तुम थोड़ा ठहर जाओ ...
... पर दिन तो दिन था -
उसको गौधूलि से पहले बीतना था, और वह बीत गया !
तुम भी तुम थे -
तुम्हें जाना ही था, और तुम चले गए !


... पर जानते हो ?
तुम जाते - जाते अपने कण - कण को -
मेरे कण - कण में बिखरा गए ...
मेरे बंद कमरे की गंध में -
बिस्तर की सिलवट में -
दर्पण के अक्स में -
दीये की लौ में -
शेल्फ़ से झाँकती किताबों में -
गुड़ की मिठास में -
पानी के झूठे गिलास में -
बाल्कनी में सजे नींबू की नारंगी में -
माथे पर बिखरे मेरे बालों में -
उँगलियों में, नाखूनों में -
दाएँ काँधे के तिल में -
गर्दन से छाती को आती और बाएँ मुड़ जाती नसों में -
मेरे बदसूरत शरीर में -
शरीर के हर रेशे में -
रेशों के अरण्य में कहीं छिपी दबी रूह में -
हाँ !
तुम जाते - जाते अपने कण - कण को -
मेरे कण - कण में बिखरा गए !

... और फिर -
साँझ ढलते - ढलते -
रात आते - आते -
मुझे अपना यकीन -
कल्पनाओं - सा, मिथ्याओं - सा लगने लगा !
तुम्हारे अचानक से होने की और फिर अचानक से -
न होने की -
मेरी कसक -
मेरा यकीन बन गई !

Monday, 24 December 2018

The redemption of the pain


Reminiscences from my diary
Dec 24, 2018
05:15 pm
GS, CD, Bangalore


कभी - कभी, गाहे - बगाहे -
यूँ ही -
एक ऐसा पल आता है जब -
मन में जमा मवाद -
रिसने लगता है  ...
जलने लगता है हर रोम, जैसे -
किसी ने नमक लगा नुकीला रुद्राक्ष -
रगड़ दिया हो मेरी हर परत पर, या -
छोड़ दिया हो, मेरे लहू में -
लपटों में लिपटा काफ़ूर !

... और, तब -
तब, उस एक पल -
तड़पता -
बिलखता -
मरता -
हर एक कतरा, मेरा -
डूब जाता है अपनी पीर में !

मेरा हर एक कतरा हो जाता है भगीरथ !

Monday, 19 November 2018

Disbanded


Reminiscences from my diary

Monday, Nov 19, 2018
07:30 pm
Murugeshpalya, Bangalore


रोज़ दिन यूँ ही बीत जाता है
रोज़ शाम यूँ ही आ जाती है
और, शाम के पहर में, यूँ ही -
- बिखर जाता हूँ मैं !
फिर, कभी किसी लम्हा -
बिखरी - बिखरी नींदों में -
बिखरी - बिखरी नींदों के बिसरे - बिसरे सपनों में -
कतरा कतरा रात, कतरा कतरा -
-मुझे जोड़ जाती है, एक बार फिर
- अगली साँझ बिखरने के लिए !



Tuesday, 18 September 2018

How I wish you were around, my friend!



Reminiscences from my diary

Sep 18, 2018
Tuesday 11:00 PM
Murugeshpalya, Bangalore


सुन, दोस्त -
सोचा है कभी कि -
- तू भी हो यहीं -
- इसी शहर में ?
जलें एक ही धूप  में
एक ही बारिश में धुलें
गुम हों एक ही भीड़ में और,
नापें एक ही सड़कें
बार बार !
साथ साथ !

शहर ही क्यों?
फ़र्ज़ कर -
हम करते हो काम एक ही दफ़्तर में !
सोचा है कभी ?
तेरी सीट हो दूसरे माले पर !
जब लिफ्ट रुके पहली मंज़िल पर -
- और मैं निकलूं, अपनी डेस्क पर जाने के लिए -
- तू, हमेशा की तरह,
दरवाज़े बंद होने तक,
मुस्कुराता रहे, और -
- दरवाज़े बंद होने तक ही -
- मैं एकटक तुझे देखता रहूं !

फिर अपनी - अपनी सीट पर आते ही -
- व्यस्त हो जाएँ हम !
सुबह से कब दोपहर हो जाये -
- पता ही न चले !
मुझे खाने की होश न रहे !
तू आये मेरे पास-
खाने पर साथ न जाने पर मुझपर गुर्राए -
और पैर पटक कर चला जाए !

फिर बीच में, यूँ ही, फ़ोन पर भेजे तू मुझको -
- कोई गाना
अपनी पसंद का या -
मेरी पसंद का या -
हम दोनों की पसंद का, जो -
काम के चलते हो जाए हमेशा की तरह -
- नज़रअंदाज़ !

मैं व्यस्त से और व्यस्त हो जाऊँ,
एक और पहर ऐसे ही ढल जाए, और फिर -
- कॉफ़ी पीने की तलब के साथ
- मुझे तेरी याद आए !
मैं ऊपर आऊँ तेरे पास !
तुझे काम में उलझा पाकर -
- कुछ देर करूँ इंतज़ार !
फिर चुपचाप चला जाऊँ और -
- दो प्याली गरम लेकर आऊँ !

तू मुस्कराये -
अपना पेन कान के ऊपर लगाकर मेरे पास आये -
मेरी कॉफ़ी को फूँक मारकर ठंडी करे, और -
- अपनी चाय पी जाए !
चुस्कियों के बीच पूछे तू -
- कैसा लगा गाना?
मैं बोलूँ  - बहुत अच्छा !
तू बनाए मुँह
पकड़ा जाए मेरा झूठ
हमेशा की तरह !
फिर तय करें हम -
- ऑफिस से निकलने का समय !
तू कहे सात, मैं कहूं -
- साढ़े छः
और बात पौने सात पर टिक जाए !

मैं पीकर कॉफ़ी अपनी -
- आ जाऊँ एक बार फिर
अपनी जगह !
एक बार फिर हो जाऊँ मशगूल -
- अपने कंप्यूटर पर !
और जब कुछ देर बाद नज़र दौड़ाऊँ -
- तो गोधूलि को खिड़की के बाहर
बिखरा पाऊँ !

तेरा फ़ोन लगाऊँ फिर, और कहूँ -
- तुझे इंतज़ार न करने के लिए, पर
तुझे खुद से भी ज़्यादा व्यस्त पाऊँ !

एक बार फिर तय करें हम -
- एक साथ ऑफिस से निकलने का समय
एक बार फिर तय करें हम -
- एक - दूसरे केआस-पास जीने का समय !

बोल, दोस्त-
सोचा है कभी कि ऐसा हो  ..
.. कि एक बार फिर एक अजनबी शहर में -
- उम्र भर वाले दोस्त बन जाएँ हम ?



Friday, 31 August 2018

You, while in Bhutan!



Reminiscences from my diary
Apr 1, 2018
Sunday 06:30 PM
Paro, Bhutan


याद है, एक बार सोचा था कि एक अलग - सी डायरी बनाऊँगा, जिसमें सिर्फ़ ख़त होंगे तुम्हारे नाम पर, तुम्हें लिखे हुए ! पिछले साल की  बात है शायद ! पर जानते हो न ! उस अलग - सी डायरी में सिर्फ़  एक ही ख़त लिख पाया ! मेरा ख़्याल है, कुछ आठ नौ पन्नों की चिट्ठी होगी ! बाकी डायरी तो यूँ ही कोरी - सी पड़ी है ! पहले अच्छा नहीं लगता था ! कहाँ तो मैंने सोचा था कि हर महीने तुम्हें एक ख़त लिखकर उसे डायरी के पते पर भेज दूँगा और उम्र के कहीं किसी मोड़ पर तुम तक पहुँचा दूँगा और कहाँ बात सिर्फ़ एक ही चिट्ठी तक रह गई ! हर मौसम की एक चिट्ठी तो लिखी होती ! यही सोच रहा था और यही सोचकर बुरा लग रहा था ! पर तभी एक दूसरी सोच ने पहली सोच को धक्का दिया ! भले ही उस डायरी के सभी पन्ने न रंगे हों  ... भले ही चिट्ठी जैसा कुछ न लिखा हो  ... पर जानते हो न कि मैंने जब से लिखना शुरू किया है, सब कुछ तुम पर, तुम्हारे इर्द - गिर्द या तुमसे ही प्रेरणा पाकर लिखा है ! अब देखो न ! शहर से दूर इस अलग देश की अलग मिट्टी को अनुभव करते हुए मैंने पल पल हर पल अपने साथ तुम्हें महसूस किया है !

फुंसोलिंग से थिम्पू का वह रास्ता जहाँ कभी धूप खिली देखी तो कभी तेज़ बरसात ने तर किया, जहाँ कभी बादलों को चीरा, तो कभी खुद को पहाड़ों की धुंध में खोया - मैंने मौसम के हर मिजाज़ में तुम्हें अपनी बगल में बैठा मुझसे बातें करता पाया ! जब खिड़की के शीशे से अपना दायाँ हाथ बाहर निकाला हुआ था, तब उस हाथ पर पड़ती गुनगुनाती धूप में तुम ही तो थे; और जब चिलचिलाती बर्फ़-सा पानी बारिश की बूँदों में ढलकर मेरे नाखूनों को छूकर मेरी हथेली की लकीरों से होते हुए सरककर मेरी बाँह को कँपा रहा था, तब भी तुम थे! हाँ, तुम ही थे !

भूटान की थिम्पू घाटी पर जब पाँव रखा था, तो लगा था जैसे मेरे साथ साथ तुम भी रोमांच से कूद पड़े हो ! पता है, जब सुन्दर थिम्पू की सुन्दर ढलान वाली कभी संकरी तो कभी चौड़ी सड़कों पर चल रहा था, तो लगता कभी तुम मेरे दाएँ चल रहे हो, तो कभी बाएँ, तो कभी मैं आगे - आगे और तुम मेरे पीछे पीछे ! कभी ऐसा भी लगा जैसे तुम भागते भागते आगे निकल गए हो और पीछे मुड़कर मुझे हाँफता हुआ देखकर हमेशा की तरह मंद-मंद मुस्कुरा रहे हो ! मुस्कुराने से याद आया - याद है, कैसे मैं तुम्हारे दोनों गालों को खींचता और तुम्हारा वह ऊपर वाला दाँत दिखने लग जाता था जिसके अस्तित्व के बारे में तुम्हारे जानने वालों में से आधों को तो पता भी नहीं होगा ! तुम्हारी उस दन्त-पंक्ति वाली लम्बी मुस्कराहट पर क्या निछावर करूँ, मैं भी नहीं जानता !

खैर  ... मैं तुम्हें यह बता रहा था कि सात समुन्दर दूर होते हुए भी कैसे मेरे इस सफ़र में तुम मेरे साथ रहे हो ! परसों जब बुद्ध की उस विशालकाय सुनहरी प्रतिमा के आगे मैं नतमस्तक हुआ तो तुम भी तो मेरे साथ ही झुके थे! है न ! खून जमाती उस ठंडी हवा में जब मेरे दांत किटकिटा रहे थे और मेरा शॉल उड़ा-उड़ा जा रहा था, तब तुम ही तो थे जिसने मेरा ठंडा हाथ अपनी गरम जैकेट की जेब में डाल लिया था और हमेशा की तरह गरम सूप पीने की ज़िद करने लगे थे ! बुद्ध के सामने उन सीढ़ियों पर बैठकर हमने ढेरों ढेर बातें की ! यकीन न आये तो पूछ लेना सामने पहाड़ों में यहाँ - वहाँ  निकलती  'गंगाओं' से या फिर दूर नीचे घाटी में बिखरे थिम्पू से ! तुमसे की गयी गुफ़्तगू के कतरे बुद्ध के चारों और छोड़ कर आया हूँ !

अगर कल की ही बात करूँ तो पुनाखा ज़ॉन्ग में पाँव हमने साथ ही तो रखे थे, वैसे ही जैसे हमेशा शिवरात्रि की सुबह दूध और बेलपत्र चढ़ाने के लिए गुरद्वारे के रास्ते में आते मंदिर के गर्भगृह में रखते थे ! प्रवेश द्वार से लेकर अंदर मंदिर को जोड़ने वाले उस छोटे से लकड़ी के पुल पर एक ओर तुम खड़े थे, एक ओर मैं और कैसे हम दोनों ही नीचे नदी में खेलती मछलियों के झुंडों को देख रहे थे ! इस मंदिर को सुशोभित करती सुनहरे बुद्ध से भी बड़ी वह प्रतिमा कैसा मोहित कर रही थी हमें ! अच्छा, जब पांच मिनट की साधना के लिए मैंने आँखें बंद की थी, तब तुम भी एकदम ध्यान में डूब गए थे न !कैसे अपनी सुध - बुध खो बैठे थे हम ! और वह तालाब याद है तुम्हें ? वही जो मंदिर के दरवाज़े से निकलकर दो और दरवाज़ों को पार कर एक बहुत ही शांत जगह पर है ! तुम्हें ऐसी जगहें बहुत पसंद हैं, जानता हूँ - शायद इसलिए कुछ देर अकेला बैठा रहा - यह सोचकर कि अमूर्त रूप में, अप्रत्यक्ष रूप में तुम भी मेरे साथ बैठे हो !

कल मैंने तुम्हें सबसे ज़्यादा 'सस्पेंशन - ब्रिज' लांघते समय महसूस किया ! नीचे  ... काफ़ी नीचे उथली पर पत्थरों को चीरती नदी  ... हरी - नीली लहरें  ... ऊपर लोहे की रस्सियों से बँधा पुल  ... पुल पर बँधे सैकड़ों रंग - बिरंगे झंडे  ... उन झंडों पर यहाँ की लिपि में रचे मन्त्र  ... उन मन्त्रों को पूरे वेग से अपने साथ उड़ाने की कोशिश करती ठंडी बयार  ... और उस बयार में अपने छोटे बालों को उड़ाने का असफल प्रयास करते पुल के दूसरे छोर पर खड़े तुम ! उस दौरान मैंने यहाँ के हर बुद्ध से प्रार्थना की थी कि काश ! वक़्त की नब्ज़ थम जाए और इस छोटी - सी नदी पर बने इस सेतु को पार करते ही सात समुन्दर पार की दूरी मिट जाए !

आज भी तो तुम मेरे साथ ही हो - यहाँ चारों ओर पहाड़ों से घिरे, पारो शहर से दूर, इस छोटे - से सुन्दर कमरे में ! मैं खिड़की की मुंडेर पर बैठकर यह सब लिख रहा हूँ और हमेशा की तरह तुम मुझे बिना कुछ कहे बस देखे जा रहे हो ! देखना ही है तो सामने सफ़ेद चमकते पहाड़ों को भी तो देखो ! लग रहा है जैसे इस समय वहाँ बर्फ़ गिर रही है ! देखना ही है तो बाईं ओर बहती नदी को भी देखो ! देखो, कैसे रास्ते में आते हर छोटे - बड़े पत्थर पर पानी उछल - उछलकर बिखर रहा है ! देखना ही है तो देखो - कैसे मैं कहीं भी आऊँ, कहीं भी जाऊँ तो कैसे तुम्हारी स्मृति मेरी तड़प बन जाती है ! 

एक बात बताना जब भी फ़ुर्सत मिले ! क्या कभी तुमने भी मुझे महसूस किया है यूँ ही, गाहे - बगाहे ?





Saturday, 25 August 2018


Annihilation


Reminiscences from my diary

Aug 19, 2018
Sunday, 02:00 AM
In Flight to Kuala Lumpur


एक समय आता है, जब -
रेशों में वजह - बेवजह पलता
दर्द
पशमीने - सा हो जाता है !
रेशे - रेशे को -
- कैवल्य मिल जाता है, तब !

***

एक समय आता है, जब -
पीड़ा की वाणी -
- सिंधु - सी हो जाती है !
शांत होते हुए भी -
एक बड़वानल पलता है, तब !
एक झंझानल पलता है, तब !

***

एक समय आता है, जब -
वेदनाओं का समूह
रचता है प्रपंच, इंद्र सा !
किसी राम की प्रतीक्षा में
हृदय
अहिल्या हो जाता है, तब !

***

एक समय आता है, जब -
नाड़ी - संहिता में यहाँ - वहाँ बिखरी -
टीस
लहू क साथ छोड़
आँखों में पलते नीर से जा मिलती है !
अनवरत बरसात होती है, तब !