Saturday, 9 May 2026

Distant trains | Moving homes | Dog years

Reminiscences from my diary

April 26, 2026
1230 pm 
Amsterdam


पुराने घर में एक कमरा था
ऊबढ़ खाबड़ सा 
माँ जितनी भी कोशिश करती सवारने - सजाने की
इसकी तासीर न बदलती
अनगढ़ था, अनगढ़ ही रहता

एक पलंग, एक ड्रेसिंग टेबल, एक कानिश, दो आले, 
दस लाल कड़ियाँ, 
कड़ियों से जब - तब झड़ता पत्थर - चूने का मलबा,
दो अलमारियाँ, अलमारियों पर सीमेंट के धब्बे, 
सीलन से फूली दीवारें और उतरता पलस्तर

इस थके थके, धीरे धीरे साँस भरते कमरे में 
एक खिड़की टंगी थी 
हरे से रंग की 
पीछे एक संकरी गली में खुलती थी
इतनी संकरी
कि एक समय में दो व्यक्ति से ज़्यादा न गुज़र पाएँ

मैं 
सर्दी के दिनों में 
इस खिड़की के पास कुर्सी मेज़ लगा लेता 
और देर रात तक पढ़ाई करने की कोशिश करता 

हिंदी फ़िल्मी गानों का बेहिसाब शौक रखने वाला मैं
अक्सर इस फ़टी कुर्सी पर बैठा, 
माँ के शॉल में लिपटा 
हिलती - डुलती मेज़ पर कोहनी टिकाए, 
सामने किताब खोले, रेडियो की तमन्ना करता हुआ
खुद को गुनगुनाता हुआ पाता

पूस की इन ठिठुरती सुनसान 
और कभी कभी सीली रातों में 
चार चाँद तब लगते 
जब
तीन किलोमीटर दूर स्टेशन से 
कोई रेलगाड़ी गुज़रती
कभी धीरे धीरे हॉर्न बजाती हुई
तो कभी 
दनादन पटरियाँ थरथराती हुई

मुझे यूँ लगता जैसे किसी ने 
अचानक 
मेरे आस पास 
सुलगा दिए हों आँच के अलाव

कभी कभी घर बदलने से खिड़कियाँ नहीं बदलतीं

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