Saturday, 26 September 2026

We're one of them

Reminiscences from my diary

Sep 26, 2026
Saturday 2245 IST
Murugeshpaklya, Bangalore


बस इतनी सी आरज़ू रही कि जब तक जीना हो, तब तक साँस में हो आस, और आस में साँस  ...

कि हम मुस्कुराते रहें और हमारे आस-पास गुज़रते - दिखते - देखते - मिलते - टूटते - जुड़ते - मुड़ते चेहरे भी  ... 

कि हर चेहरा एक-दूसरे से कटा-बना है, जैसे एक सूरज से कई कई चाँद, किससे छूटी स्टारडस्ट  किसके हिस्से आयी, किसको पता  ... 

इतना ही भरम रखना कि कम-अज़-कम ब्रह्माण्ड एक था, और एक ही रहेगा, कितनी सुन्दर बात है  ... 

और यह भी कि जब इस मंतर का प्रेत थक जाए, और हम भी होने लगे निढाल, तब हँसते-हँसते थामे हाथ सितारों का, घुल-मिल जाएँ, और टिमटिमाएँ 

टिमटिम

टि
म
टि
म  

एक दिन कोई रूमी छिपते-छिपाते छत की सीढ़ियाँ चढ़ेगा, टकटकी लगाएगा रात के सियाह में  ...

और पा ही जाएगा आसमान का सबसे चमकीला ध्रुव 

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