Wednesday, 6 February 2019

The last exam, Reminiscences - 5


Reminiscences from my diary
July 31, 2011
Bangalore, 2 AM


27 मई 2011 की उस आखिरी परीक्षा के लिए -
हमेशा की तरह देर होने के कारण -
जल्दी - जल्दी तैयार होते होते -
नज़र पड़ गयी थी सलिल पर !
इंतज़ार कर रहा था हमेशा की तरह -
चुप चाप -
दीवार के सहारे खड़ा हुआ -
सफ़ेद - लाल चैक की कमीज़ -
बाहर निकली हुई -
कंधे पर वही नीला बैग -
बस एकटक निहारे जा रहा था मुझे  ..
और मैं -
नज़रें चुरा रहा था उससे  ...
आँखें भरी हुई थी मेरी !
आखिरी एक्ज़ाम था वह -
- जो हम साथ देने जा रहे थे !
वह नमी, वे आँसू , वह इंतज़ार -
वही A - हॉस्टल के A 118 के दरवाज़े पर -
- छूट गए हैं !
वे आँसू , वह इंतज़ार फिर से महसूस करना चाहता हूँ,
संजोना चाहता हूँ शायद हमेशा के लिए !

Tuesday, 22 January 2019

Penance


Reminiscences from my diary

Jan 22, 2019
Tuesday 06:15 pm
Murugeshpalya, Bangalore


जब - जब, मैंने -
तुम्हारे
तुम होने की पराकाष्ठा को
समझने का
आंकने का
प्रयास किया है -
तब - तब, तुम्हारे -
तुम होने की परिधि को
विस्तृत होता पाया है !

शायद इसी कारण
मैं -
उन हमेशाओं के 'तुम' से लेकर
इन हमेशाओं के 'तुम' को जोड़ते
इस सेतु पर
चले जा रहा हूँ
बस... चले जा रहा हूँ
समय, काल, दिशा, यथार्थ - सबको पार करता
समय, काल, दिशा, यथार्थ - सबसे पार होता !

कभी - कभी, किसी कदम -
सेतु चरमराता है
पाँव डगमगाता है
साँस फूलता है
मन झूलता है
पर फिर -
अगले कदम के साथ
सेतु, पाँव, साँस, मन -
सब पहले जैसे हो जाते हैं
समय, काल, दिशा, यथार्थ - सबको पार करते
समय, काल, दिशा, यथार्थ - सबसे पार होते !

जब से यह सफ़र शुरू किया, तब से -
तुम -
एक हताशा - से
मेरे साथ - साथ चले हो
साथ - साथ थमे हो
और फिर
साथ - साथ ही आगे बढ़े हो !
हाँ  ...
तुम्हारे
एक 'तुम' से एक नया 'तुम' हो जाना
और
उस नए 'तुम' तक पहुँचने में
कितने ही तुमों से पार होना
एक हताशा ही तो है,  मेरे जीवन की -
एक अनिवार्य हताशा !
और
इस हताशा से लड़ते - लड़ते
मैंने बाकी सभी हताशाओं को
अस्वीकार किया है
उनके साथ -
अन्याय किया है !

किसी भी यात्रा के दौरान
भेंट होती हर हताशा से लड़ना
जूझना
जीतना
हारना
मेरे 'मैं' होने का कर्त्तव्य था
जिसका निर्वाह
मेरा 'मैं' नहीं कर पाया !

और अब
जब यह समझा हूँ
तो सोचता हूँ
किसी शम्स
किसी मुक्तिबोध
किसी सूर्यकान्त, या
किसी अमृता ने
कभी तो
कहीं तो
लिखा होगा
ऐसे ही पाप को जीते - जीते
ऐसे ही पाप के
प्रायश्चित का कोई उपाय !



Friday, 28 December 2018

Three-piece certitude...


Reminiscences from my diary
Dec 28, 2018
08:15 pm
Murugeshpalya, Bangalore


तीन बातें हैं  ...

पहली बात -
तुम्हें मुझसे कुछ शिकायतें हैं और -
मुझे तुमसे !

दूसरी बात -
तुम्हें मेरी शिकायतें पता है और -
मुझे तुम्हारी !

तीसरी और आखिरी बात -
एक - सी नहीं हैं तुम्हारी और मेरी -
शिकायतें !

Wednesday, 26 December 2018

Odds of a December afternoon


Reminiscences from my diary
Dec 26, 2018 03: 30 PM
GS,  CD,  Bangalore

तुम्हारा मेरे पास आना -
मुझसे मिलना, मेरे साथ -
वक़्त गुज़ारना, हँसना, बतियाना, सकुचाना -
यह सब मेरे लिए 'शायद' था !
कल्पनाओं - सा शायद !
मिथ्याओं - सा, मिथकों - सा शायद !
अधजगी रात के अधपके सपने - सा शायद !
यह शायद यकीन बने - चाहा हमेशा था, पर -
यह शायद यकीन बनेगा - माना कभी नहीं था !

... पर फिर एक दिन आया !
किसी भटकती आकाश गंगा के
भटकते पिंड - सा
एक कायनाती दिन !
टूटी खिड़की की जंग लगी जाली से घुसता
भोर की धूप के टुकड़े - सा
एक उजला दिन !
कल्पों से मेंह की राह तकते
बंजर मरु को मुक्ति देता
सलिल से सीला दिन !

... उस दिन,
तुम वाकई मेरे पास आए -
मुझसे मिले, मेरे साथ -
वक़्त गुज़ारा, हँसे, बतियाए, सकुचाए ...!
उस दिन -
तुम 'शायद' नहीं, यकीनन एक यकीन थे !

मानो या न मानो -
उस दिन, मैंने -
हर नक्षत्र -
हर गंगा -
हर शिव से प्रार्थना की थी कि -
दिन थोड़ा ठहर जाए -
वक़्त थोड़ा ठहर जाए -
तुम थोड़ा ठहर जाओ ...
... पर दिन तो दिन था -
उसको गौधूलि से पहले बीतना था, और वह बीत गया !
तुम भी तुम थे -
तुम्हें जाना ही था, और तुम चले गए !


... पर जानते हो ?
तुम जाते - जाते अपने कण - कण को -
मेरे कण - कण में बिखरा गए ...
मेरे बंद कमरे की गंध में -
बिस्तर की सिलवट में -
दर्पण के अक्स में -
दीये की लौ में -
शेल्फ़ से झाँकती किताबों में -
गुड़ की मिठास में -
पानी के झूठे गिलास में -
बाल्कनी में सजे नींबू की नारंगी में -
माथे पर बिखरे मेरे बालों में -
उँगलियों में, नाखूनों में -
दाएँ काँधे के तिल में -
गर्दन से छाती को आती और बाएँ मुड़ जाती नसों में -
मेरे बदसूरत शरीर में -
शरीर के हर रेशे में -
रेशों के अरण्य में कहीं छिपी दबी रूह में -
हाँ !
तुम जाते - जाते अपने कण - कण को -
मेरे कण - कण में बिखरा गए !

... और फिर -
साँझ ढलते - ढलते -
रात आते - आते -
मुझे अपना यकीन -
कल्पनाओं - सा, मिथ्याओं - सा लगने लगा !
तुम्हारे अचानक से होने की और फिर अचानक से -
न होने की -
मेरी कसक -
मेरा यकीन बन गई !

Monday, 24 December 2018

The redemption of the pain


Reminiscences from my diary
Dec 24, 2018
05:15 pm
GS, CD, Bangalore


कभी - कभी, गाहे - बगाहे -
यूँ ही -
एक ऐसा पल आता है जब -
मन में जमा मवाद -
रिसने लगता है  ...
जलने लगता है हर रोम, जैसे -
किसी ने नमक लगा नुकीला रुद्राक्ष -
रगड़ दिया हो मेरी हर परत पर, या -
छोड़ दिया हो, मेरे लहू में -
लपटों में लिपटा काफ़ूर !

... और, तब -
तब, उस एक पल -
तड़पता -
बिलखता -
मरता -
हर एक कतरा, मेरा -
डूब जाता है अपनी पीर में !

मेरा हर एक कतरा हो जाता है भगीरथ !

Monday, 19 November 2018

Disbanded


Reminiscences from my diary

Monday, Nov 19, 2018
07:30 pm
Murugeshpalya, Bangalore


रोज़ दिन यूँ ही बीत जाता है
रोज़ शाम यूँ ही आ जाती है
और, शाम के पहर में, यूँ ही -
- बिखर जाता हूँ मैं !
फिर, कभी किसी लम्हा -
बिखरी - बिखरी नींदों में -
बिखरी - बिखरी नींदों के बिसरे - बिसरे सपनों में -
कतरा कतरा रात, कतरा कतरा -
-मुझे जोड़ जाती है, एक बार फिर
- अगली साँझ बिखरने के लिए !



Tuesday, 18 September 2018

How I wish you were around, my friend!



Reminiscences from my diary

Sep 18, 2018
Tuesday 11:00 PM
Murugeshpalya, Bangalore


सुन, दोस्त -
सोचा है कभी कि -
- तू भी हो यहीं -
- इसी शहर में ?
जलें एक ही धूप  में
एक ही बारिश में धुलें
गुम हों एक ही भीड़ में और,
नापें एक ही सड़कें
बार बार !
साथ साथ !

शहर ही क्यों?
फ़र्ज़ कर -
हम करते हो काम एक ही दफ़्तर में !
सोचा है कभी ?
तेरी सीट हो दूसरे माले पर !
जब लिफ्ट रुके पहली मंज़िल पर -
- और मैं निकलूं, अपनी डेस्क पर जाने के लिए -
- तू, हमेशा की तरह,
दरवाज़े बंद होने तक,
मुस्कुराता रहे, और -
- दरवाज़े बंद होने तक ही -
- मैं एकटक तुझे देखता रहूं !

फिर अपनी - अपनी सीट पर आते ही -
- व्यस्त हो जाएँ हम !
सुबह से कब दोपहर हो जाये -
- पता ही न चले !
मुझे खाने की होश न रहे !
तू आये मेरे पास-
खाने पर साथ न जाने पर मुझपर गुर्राए -
और पैर पटक कर चला जाए !

फिर बीच में, यूँ ही, फ़ोन पर भेजे तू मुझको -
- कोई गाना
अपनी पसंद का या -
मेरी पसंद का या -
हम दोनों की पसंद का, जो -
काम के चलते हो जाए हमेशा की तरह -
- नज़रअंदाज़ !

मैं व्यस्त से और व्यस्त हो जाऊँ,
एक और पहर ऐसे ही ढल जाए, और फिर -
- कॉफ़ी पीने की तलब के साथ
- मुझे तेरी याद आए !
मैं ऊपर आऊँ तेरे पास !
तुझे काम में उलझा पाकर -
- कुछ देर करूँ इंतज़ार !
फिर चुपचाप चला जाऊँ और -
- दो प्याली गरम लेकर आऊँ !

तू मुस्कराये -
अपना पेन कान के ऊपर लगाकर मेरे पास आये -
मेरी कॉफ़ी को फूँक मारकर ठंडी करे, और -
- अपनी चाय पी जाए !
चुस्कियों के बीच पूछे तू -
- कैसा लगा गाना?
मैं बोलूँ  - बहुत अच्छा !
तू बनाए मुँह
पकड़ा जाए मेरा झूठ
हमेशा की तरह !
फिर तय करें हम -
- ऑफिस से निकलने का समय !
तू कहे सात, मैं कहूं -
- साढ़े छः
और बात पौने सात पर टिक जाए !

मैं पीकर कॉफ़ी अपनी -
- आ जाऊँ एक बार फिर
अपनी जगह !
एक बार फिर हो जाऊँ मशगूल -
- अपने कंप्यूटर पर !
और जब कुछ देर बाद नज़र दौड़ाऊँ -
- तो गोधूलि को खिड़की के बाहर
बिखरा पाऊँ !

तेरा फ़ोन लगाऊँ फिर, और कहूँ -
- तुझे इंतज़ार न करने के लिए, पर
तुझे खुद से भी ज़्यादा व्यस्त पाऊँ !

एक बार फिर तय करें हम -
- एक साथ ऑफिस से निकलने का समय
एक बार फिर तय करें हम -
- एक - दूसरे केआस-पास जीने का समय !

बोल, दोस्त-
सोचा है कभी कि ऐसा हो  ..
.. कि एक बार फिर एक अजनबी शहर में -
- उम्र भर वाले दोस्त बन जाएँ हम ?