Monday, 8 March 2021

The wish carriers

Reminiscenes from my diary

March 8, 2021
Monday, 11 pm
Sre

जब - जब भी
मैं -
तुम्हारी
बड़ी हथेलियों की ओक में
पूरा का पूरा 
आ सिमटा.. 

तब - तब
तुम्हारी आँख से 
एक पलक
बहती - बहती
मेरी हथेलियों की ओक में
आ गिरी .. 

इधर मैं -
तपाक से
आँख बंद कर
कोई अफसून बुदबुदाता
और उधर -
तुम्हारी फूँक
तुम्हारी ही पलक को
बहा ले जाती कहीं .. 

खैर .. 

किसकी कितनी प्रार्थनाएँ पूरीं हुईं 
तुम जानो, या जानें -
ब्रह्मांड में तैरती -
अनगिनत पलकें .. 
मैं जानूँ
तो बस .. 

तुम्हारी बड़ी हथेलियों की गंध
और
तुम्हारी बड़ी हथेलियों का स्पर्श .. 

Sunday, 7 March 2021

The quest for my sky

Reminiscences from my diary

March 6, 2021
Sunday, 09.45 pm
Sre

इंद्रधनुष पर पाँव रखा ही था कि
सभी सितारे
एक साथ
मुझसे यूँ लड़ पड़े
मानो
उनसे उनका
सारा आकाश छीन लिया हो मैंने! 

मैं घबराकर
पीछे हट गया ! 

मैंने कब चाहा 
सारा का सारा आसमान
माँगा तो बस -
उसके सबसे महीन कतरे से
एक कतरा
और, उस कतरे में
एक तारे जितना
आकाश! 

Monday, 8 February 2021

The lives, parallel, and the lines!


Reminiscences from my diary

Feb 08, 2021
Monday, 10:15 pm
Murugeshpalya, Bangalore


समानांतर 
सरल 
रेखाएँ 
चाहे 
दूर 
हों 
या 
समीप 
या
बहुत
समीप
... 
...
... 
कभी 
नहीं 
मिलतीं 
.
.

Thursday, 4 February 2021

You came! You stayed!



Reminiscences from my diary

Feb 4, 2021
Thursday 11 pm
Murugeshpalya, Bangalore


उस दोपहरी 
तुम्हारा आना 

क्लांत मरु में घिर आया हो 
नागार्जुन का बादल  

टुक - टुक टुकरती आँख में ठहर जाए 
शरद का चाँद 

पूस की रात में दूर कहीं दिख जाए 
एक अलाव 

बीजी की ईदी 
बाबा के किस्से 

उस साँझ 
तुम्हारा जाना 

मुद्दत से भागती सड़क पर
पसरे अचानक एक सन्नाटा 

खाली घर के खाली कोने 
भर जाएँ किसी गूँज से 

मसली जाए 
बसंत में खिलती कली 

रात बरसाती बने 
रुदाली 


Wednesday, 27 January 2021

Listen O Moon!

Reminiscences from my diary

Jan 27, 2021
Wed, 10:40 pm
Murugeshpalya, Bangalore


सुनो चँदा !
फ़र्ज़ करो
कोई लगभग पूरा हो 

लगभग

और
लगभग पूरा होने से 
पूरा पूरा होने तक का सफ़र
कुछ-एक प्रकाश - वर्ष जितना हो जाए ?

कितनी भटकन होगी !
कितनी तड़पन होगी !

सुनो चंदा !
अब यूँ करो कि
फ़र्ज़ करो या न करो 
पर
तुम्हारी तकदीर 
उन सैकड़ों अधूरों की
तकदीरों से 
कुछ-एक प्रकाश वर्ष गुना
ज़्यादा पूरी है !


Monday, 11 January 2021

The palms

Reminiscences from my diary

Jan 11, 2021
Monday, 09:55 pm
Murugeshpalya, Bangalore


एक पल है 
कहीं किसी आयाम में 
अटका हुआ 

एक पल, जब 
तुम्हारी हथेलियों पर 
रोपा था मैंने 
अपना कैवल्य 

मायाजाल - सी रेखाओं में 
तुम्हारी 
मकड़जाल - सा मानस 
मेरा 
बहा था
जैसे धमनियों में रक्त 
बहते - बहते 
हो गया था 
भागीरथी 

अस्तु !
तुम्हारी उँगलियाँ, एकाएक 
हो गयीं थीं 
शिव .. 

Friday, 1 January 2021

O, my dear friend!

Reminiscences from my diary

Jan 01, 2021
Friday, 10:55 pm
Murugeshpalya, Bangalore


सुनो !
आज उदास लग रहे हो तुम 
बहुत उदास !
मानो, तुम -
तुम नहीं !
कल तो कितना खिल रहे थे 
खिला रहे थे !
क्या हुआ अचानक ?
मुझे बताओ !
मैं भी तो सब कुछ कहता हूँ तुमसे !

कल रात तो तुमने -
कितनी ही आतिशबाजी देखी होगी 
कितने ही रंग 
कितनी ही रोशनी 
कितनी ही चमक 
कितना ही उल्लास 
कितनी ही आशाएँ !
शाम से ही झूम रहे थे तुम तो, कल !

फिर क्या हुआ ?
बेचैन क्यों दिख रहे हो ?
तुम तो जानते हो, कितनी ही आँखें -
तुमसे उजास पाती हैं !
यूँ दिखोगे तो कितनी ही बेबसी -
ठहर जाएगी उनमें !
है न ?

मुझे लग रहा है -
मेरी फितरत का भूत चढ़ गया है तुम्हारे सिर 
और यह तो ठीक बात नहीं है !

अब सुनो, चुपचाप !
चाहते हो 'गर तुम -
मैं न करूँ शिव से शिकायत तुम्हारी, तो -
एक लम्बी साँस लो 
झटको यह चोला, और -
वैसे ही हो जाओ, जैसे हो तुम !
फबती नहीं है तुम पर उदासी !

न जाने कितने ही कवि 
तुम्हारे तुम होने की राह में 
अपनी कलम बिछाए बैठे होंगे !