Thursday, 31 March 2022

Broken! 


Reminiscences from my diary

Mar 31, 2022
Thu, 1140 pm
Murugeshpalya, Bangalore


तार-तार होने के लिए
तार
तार
होना
ज़रूरी नहीं ! 

एक महीन 
बहुत महीन तरेड़ भी
आपकी 
नियति
हो सकती है ! 


Tuesday, 29 March 2022

The Pariah Wanderings! 

Reminiscences from my diary

Mar 29, 2022
Wed, 0010 hrs
Murugeshpalya, Bangalore


क्षितिज से लुढ़का आँसू
न आँख भर पाता है
न 
ही 
मन ! 

कभी-कभी, सैकड़ों में से 
एक आधी भटकन
जन्मजात -
अघोरी
होती 
है ! 

Monday, 28 March 2022

Inanimate! 


Reminiscences from my diary

March 29, 2022
Tue, 0015 hrs
Murugeshpalya, Bangalore


मेरी कविताओं की नींव में 
शून्य था जो -
उसने 
निगल लिया है 
ईश्वर! 

अब सब जड़ है! 
मैं भी! 
मेरी कविताएँ भी! 

Sunday, 6 March 2022

Yet another splendid time with The Himalayas!

Reminiscences from my diary

March 06, 2022
Sunday 0700 p,m
Nainital Lake

आज शाम भी वही रास्ता लिया जो पिछले एक सप्ताह से अपना रहा हूँ। वही पहर, वही होटल, वही होटल से लुढ़कती ढलान, ढलान से कटता बड़ा-बाज़ार, उसका ऊबड़ - खाबड़ संकरा रास्ता, उस रस्ते के दोनों ओर हर तरह की दुकानें, उन छोटी-छोटी दुकानों की अजीब - सी मासूमियत, बीचों-बीच पसरे वही पहाड़ी झबरीले कुत्ते, बाज़ार झाँकते पहाड़ों की टोलियाँ और उन पर उगे लम्बे-लम्बे चीड़ और देवदार ! और फिर बड़ा - बाज़ार कब मॉल रोड में मिल जाता है, न मुझे पता चलता है न ही बड़े - बाज़ार की गलियों को !

ख़ैर ... 

मैं कह रहा था कि आज भी वैसी ही ठिठुरती शाम और वैसी ही शॉल में लिपटी दिनचर्या। पर अंतर भी था एक ! आज पूरे रास्ते आँखें बड़ी कर कर के चलता रहा। हाँ ! हास्यास्पद लग सकता है पर ऐसा ही हुआ। मैं शायद कोशिश कर रहा था कि जाने से पहले आँखों के आगे पसरा सारा हिमालय इनमें समेट लूँ !  यह लिखते हुए भी मैं खुद को खुद पर मुस्कराने से रोक नहीं पा रहा हूँ।  ऐसा भी होता है भला ?! ऐसा होता 'गर तो आँखें महज़ कविताओं में ही नहीं, सच में ही कलेइडोस्कोप होतीं !

ख़ैर ... 

कितनी ही बार बीच - बीच में रुक रुककर  एकटक ताकता रहा दूर तक फैले चीड़ों को और उन पर चमचमाती गोधूलि की लालिमा को। सौंदर्य का, या यूँ कहूँ, नैसर्गिक सौंदर्य का अनूठा उदाहरण हैं मेरे लिए - साँझ की जाती धूप में नहाये हिमालय के जंगली चीड़। और जो इन्हें सुन्दर न माने, उसकी आँखें आँखें नहीं, दो कौड़ी के काले पत्थर !

कानों में इयरफोन लगाए अपने अंदर उतरा मैं कितने इत्मीनान से झील के किनारे चलता रहा पर बड़ी - बड़ी आँखों के साथ मानो हिमालय ही नहीं , नैनी का पानी भी अपनी आँखों में समेटना चाहूँ (हालांकि अगर ऐसा कभी हुआ भी तो कई जन्म लग जायेंगे आँखों से कचरा निकालते - निकालते)! सूरज ढलते - ढलते जब झील के उस पार एक के बाद एक रंग - बिरंगी रोशनियाँ जलने लगीं और उन सब रोशनियों की रंगीन परछाइयाँ पानी में मचलने लगीं तो कुछ ऐसा दृश्य मेरे सामने आया जिसे हर शाम एकटक देखने के लिए मैं कुछ भी कर जाऊँ !

जुनूनियत है या सुंकूनियत - मैं नहीं जानता ! पर कुछ तो है कि मैं कहीं भी आऊँ , कहीं भी जाऊँ, मन का एक टुकड़ा यहीं अटका रहता है।  क्या पता किसी पिछले जन्म में मैं कोई चीड़ ही था यहीं कहीं किसी ढलान पर उगा हुआ !

ख़ैर ...  

कॉफ़ी पीने की हल्की -हल्की तलब लग रही है।  उँगलियाँ भी सुन्न पड़ने लगी हैं।  पर मन है कि यहाँ से उठने को कर ही नहीं रहा है। बीच - बीच में ये बड़ी आँखें भर भी आती हैं पर सोचने पर भी नहीं बूझ पाता कोई कारण ! क्या स्मृतियों का परिताप है जो दस्तक दे रहा है ? या तो इतने ख़्याल हैं कि मैं बूझ नहीं पाता कौन सा अमुक ख़्याल मुझे चुभ रहा है, या फिर कुछ भी नहीं ! आसमान का काला पहाड़ों के हरे पर छितरा गया है। मैं बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ पर मेरे अक्खर-अक्खर माझी अपनी नाव के साथ लिए जा रहा है ! मैं एक बार फिर जा रहा हूँ कई कई बार लौटने के लिए  ... 


Friday, 4 February 2022

Hugs

Reminiscences from my diary

Feb 05, 2022
Vasant Panchmi
Bangalore airport


तुम्हारा 
बेहद इत्मिनान से
गले लगाना
और कुछ देर
गले लगाए रखना
मुझे बेहिसाब सुकून देता है! 

कुछ ऐसा-सा सुकून 
जो
दिसंबर की मनाली में
चीड़ के ऊपर टंके
पूरे चाँद को देखते हुए
अलाव सेकने पर मिले! 

उन चंद पलों में बुनी हुई
गर्माहट
मुझे 
काफ़ी वक़्त तक 
हर तरह की 
ठिठुरन से
बचाये रखती है! 

Friday, 17 December 2021

Not a pole star

Reminiscences from my diary

Dec 17, 2021
Friday 07:45 pm
Murugeshpalya, Bangalore


तारों को टूटता देखने पर 
मन्नतों का जंगल रोपना 

मन्नतों के टूटने पर 
आप सितारा बन जाना 

फिर आप टूटकर 
किसी और की मन्नत में पिर जाना 


सैयारगी 
दीवानगी का 
आखिरी पड़ाव है !

Friday, 10 December 2021

Un-knitted!

Reminiscences from my diary

Dec 10, 2021
Friday 02:00 pm
ORRB, GS, Bangalore

कभी कभी कुछ यूँ होता है कि मज़बूत, कसी हुई गिरहों का एक छोर किसी ऐसे के हाथ लग जाता है कि धीरे धीरे - धीरे धीरे आप खुलने लगते हैं। पुल के उस पार से धागा खिंचता है और इधर ... इधर गिरहें ढीली पड़ने लगती हैं।  गाहे - बगाहे किसी की निजता आपकी निजता तक पहुँचने का सेतु पा जाती है और शुरू हो जाता है पग - पग नपता सफ़र। आपको लगता है आप खुल रहे हैं, परत दर परत सुलझ रहे हैं, आपकी रूह को, आपकी मुश्क़ को आख़िरकार बंद पिटारे से निजात मिलती जा रही है और आप बसंत में घुल रहे हैं।  

और यहीं  ... बस यहीं आप धोख़ा खा जाते हैं। आप जिसे खुलना समझते हैं, वह हमेशा ही खुलना नहीं होता। 

आप असल में उधड़ रहे होते हैं ...

धागा - धागा  ..
रेशा - रेशा  ..
लम्हा - लम्हा  .. 

उधड़न की कसक आपको चकमा दे जाती है। आपको पतझड़ की घुटन भी वसंत की बयार लगती है। मुझे कई बार लगता है कि खुलने और उधड़ने का अंतर उतना ही महीन है जितना एक साँस का होने और न होने तक का फ़ासला। 

ख़ैर  .. एक वक़्त, एक उम्र के बाद इस अंतर का, इसके होने का फ़र्क़ नहीं पड़ता। खुलें या उधड़ें  - दोनों में ही वापसी की कोई सम्भावना नहीं। छूटी हुई ख़ुशबू वापिस बसेरा कभी नहीं पाती ! और उधड़ी ऊन से बुने स्वेटर में भी पहले जैसा निवाच रहता है भला ?