Monday, 19 November 2018

Disbanded


Reminiscences from my diary

Monday, Nov 19, 2018
07:30 pm
Murugeshpalya, Bangalore


रोज़ दिन यूँ ही बीत जाता है
रोज़ शाम यूँ ही आ जाती है
और, शाम के पहर में, यूँ ही -
- बिखर जाता हूँ मैं !
फिर, कभी किसी लम्हा -
बिखरी - बिखरी नींदों में -
बिखरी - बिखरी नींदों के बिसरे - बिसरे सपनों में -
कतरा कतरा रात, कतरा कतरा -
-मुझे जोड़ जाती है, एक बार फिर
- अगली साँझ बिखरने के लिए !



Tuesday, 18 September 2018

How I wish you were around, my friend!



Reminiscences from my diary

Sep 18, 2018
Tuesday 11:00 PM
Murugeshpalya, Bangalore


सुन, दोस्त -
सोचा है कभी कि -
- तू भी हो यहीं -
- इसी शहर में ?
जलें एक ही धूप  में
एक ही बारिश में धुलें
गुम हों एक ही भीड़ में और,
नापें एक ही सड़कें
बार बार !
साथ साथ !

शहर ही क्यों?
फ़र्ज़ कर -
हम करते हो काम एक ही दफ़्तर में !
सोचा है कभी ?
तेरी सीट हो दूसरे माले पर !
जब लिफ्ट रुके पहली मंज़िल पर -
- और मैं निकलूं, अपनी डेस्क पर जाने के लिए -
- तू, हमेशा की तरह,
दरवाज़े बंद होने तक,
मुस्कुराता रहे, और -
- दरवाज़े बंद होने तक ही -
- मैं एकटक तुझे देखता रहूं !

फिर अपनी - अपनी सीट पर आते ही -
- व्यस्त हो जाएँ हम !
सुबह से कब दोपहर हो जाये -
- पता ही न चले !
मुझे खाने की होश न रहे !
तू आये मेरे पास-
खाने पर साथ न जाने पर मुझपर गुर्राए -
और पैर पटक कर चला जाए !

फिर बीच में, यूँ ही, फ़ोन पर भेजे तू मुझको -
- कोई गाना
अपनी पसंद का या -
मेरी पसंद का या -
हम दोनों की पसंद का, जो -
काम के चलते हो जाए हमेशा की तरह -
- नज़रअंदाज़ !

मैं व्यस्त से और व्यस्त हो जाऊँ,
एक और पहर ऐसे ही ढल जाए, और फिर -
- कॉफ़ी पीने की तलब के साथ
- मुझे तेरी याद आए !
मैं ऊपर आऊँ तेरे पास !
तुझे काम में उलझा पाकर -
- कुछ देर करूँ इंतज़ार !
फिर चुपचाप चला जाऊँ और -
- दो प्याली गरम लेकर आऊँ !

तू मुस्कराये -
अपना पेन कान के ऊपर लगाकर मेरे पास आये -
मेरी कॉफ़ी को फूँक मारकर ठंडी करे, और -
- अपनी चाय पी जाए !
चुस्कियों के बीच पूछे तू -
- कैसा लगा गाना?
मैं बोलूँ  - बहुत अच्छा !
तू बनाए मुँह
पकड़ा जाए मेरा झूठ
हमेशा की तरह !
फिर तय करें हम -
- ऑफिस से निकलने का समय !
तू कहे सात, मैं कहूं -
- साढ़े छः
और बात पौने सात पर टिक जाए !

मैं पीकर कॉफ़ी अपनी -
- आ जाऊँ एक बार फिर
अपनी जगह !
एक बार फिर हो जाऊँ मशगूल -
- अपने कंप्यूटर पर !
और जब कुछ देर बाद नज़र दौड़ाऊँ -
- तो गोधूलि को खिड़की के बाहर
बिखरा पाऊँ !

तेरा फ़ोन लगाऊँ फिर, और कहूँ -
- तुझे इंतज़ार न करने के लिए, पर
तुझे खुद से भी ज़्यादा व्यस्त पाऊँ !

एक बार फिर तय करें हम -
- एक साथ ऑफिस से निकलने का समय
एक बार फिर तय करें हम -
- एक - दूसरे केआस-पास जीने का समय !

बोल, दोस्त-
सोचा है कभी कि ऐसा हो  ..
.. कि एक बार फिर एक अजनबी शहर में -
- उम्र भर वाले दोस्त बन जाएँ हम ?



Friday, 31 August 2018

You, while in Bhutan!



Reminiscences from my diary
Apr 1, 2018
Sunday 06:30 PM
Paro, Bhutan


याद है, एक बार सोचा था कि एक अलग - सी डायरी बनाऊँगा, जिसमें सिर्फ़ ख़त होंगे तुम्हारे नाम पर, तुम्हें लिखे हुए ! पिछले साल की  बात है शायद ! पर जानते हो न ! उस अलग - सी डायरी में सिर्फ़  एक ही ख़त लिख पाया ! मेरा ख़्याल है, कुछ आठ नौ पन्नों की चिट्ठी होगी ! बाकी डायरी तो यूँ ही कोरी - सी पड़ी है ! पहले अच्छा नहीं लगता था ! कहाँ तो मैंने सोचा था कि हर महीने तुम्हें एक ख़त लिखकर उसे डायरी के पते पर भेज दूँगा और उम्र के कहीं किसी मोड़ पर तुम तक पहुँचा दूँगा और कहाँ बात सिर्फ़ एक ही चिट्ठी तक रह गई ! हर मौसम की एक चिट्ठी तो लिखी होती ! यही सोच रहा था और यही सोचकर बुरा लग रहा था ! पर तभी एक दूसरी सोच ने पहली सोच को धक्का दिया ! भले ही उस डायरी के सभी पन्ने न रंगे हों  ... भले ही चिट्ठी जैसा कुछ न लिखा हो  ... पर जानते हो न कि मैंने जब से लिखना शुरू किया है, सब कुछ तुम पर, तुम्हारे इर्द - गिर्द या तुमसे ही प्रेरणा पाकर लिखा है ! अब देखो न ! शहर से दूर इस अलग देश की अलग मिट्टी को अनुभव करते हुए मैंने पल पल हर पल अपने साथ तुम्हें महसूस किया है !

फुंसोलिंग से थिम्पू का वह रास्ता जहाँ कभी धूप खिली देखी तो कभी तेज़ बरसात ने तर किया, जहाँ कभी बादलों को चीरा, तो कभी खुद को पहाड़ों की धुंध में खोया - मैंने मौसम के हर मिजाज़ में तुम्हें अपनी बगल में बैठा मुझसे बातें करता पाया ! जब खिड़की के शीशे से अपना दायाँ हाथ बाहर निकाला हुआ था, तब उस हाथ पर पड़ती गुनगुनाती धूप में तुम ही तो थे; और जब चिलचिलाती बर्फ़-सा पानी बारिश की बूँदों में ढलकर मेरे नाखूनों को छूकर मेरी हथेली की लकीरों से होते हुए सरककर मेरी बाँह को कँपा रहा था, तब भी तुम थे! हाँ, तुम ही थे !

भूटान की थिम्पू घाटी पर जब पाँव रखा था, तो लगा था जैसे मेरे साथ साथ तुम भी रोमांच से कूद पड़े हो ! पता है, जब सुन्दर थिम्पू की सुन्दर ढलान वाली कभी संकरी तो कभी चौड़ी सड़कों पर चल रहा था, तो लगता कभी तुम मेरे दाएँ चल रहे हो, तो कभी बाएँ, तो कभी मैं आगे - आगे और तुम मेरे पीछे पीछे ! कभी ऐसा भी लगा जैसे तुम भागते भागते आगे निकल गए हो और पीछे मुड़कर मुझे हाँफता हुआ देखकर हमेशा की तरह मंद-मंद मुस्कुरा रहे हो ! मुस्कुराने से याद आया - याद है, कैसे मैं तुम्हारे दोनों गालों को खींचता और तुम्हारा वह ऊपर वाला दाँत दिखने लग जाता था जिसके अस्तित्व के बारे में तुम्हारे जानने वालों में से आधों को तो पता भी नहीं होगा ! तुम्हारी उस दन्त-पंक्ति वाली लम्बी मुस्कराहट पर क्या निछावर करूँ, मैं भी नहीं जानता !

खैर  ... मैं तुम्हें यह बता रहा था कि सात समुन्दर दूर होते हुए भी कैसे मेरे इस सफ़र में तुम मेरे साथ रहे हो ! परसों जब बुद्ध की उस विशालकाय सुनहरी प्रतिमा के आगे मैं नतमस्तक हुआ तो तुम भी तो मेरे साथ ही झुके थे! है न ! खून जमाती उस ठंडी हवा में जब मेरे दांत किटकिटा रहे थे और मेरा शॉल उड़ा-उड़ा जा रहा था, तब तुम ही तो थे जिसने मेरा ठंडा हाथ अपनी गरम जैकेट की जेब में डाल लिया था और हमेशा की तरह गरम सूप पीने की ज़िद करने लगे थे ! बुद्ध के सामने उन सीढ़ियों पर बैठकर हमने ढेरों ढेर बातें की ! यकीन न आये तो पूछ लेना सामने पहाड़ों में यहाँ - वहाँ  निकलती  'गंगाओं' से या फिर दूर नीचे घाटी में बिखरे थिम्पू से ! तुमसे की गयी गुफ़्तगू के कतरे बुद्ध के चारों और छोड़ कर आया हूँ !

अगर कल की ही बात करूँ तो पुनाखा ज़ॉन्ग में पाँव हमने साथ ही तो रखे थे, वैसे ही जैसे हमेशा शिवरात्रि की सुबह दूध और बेलपत्र चढ़ाने के लिए गुरद्वारे के रास्ते में आते मंदिर के गर्भगृह में रखते थे ! प्रवेश द्वार से लेकर अंदर मंदिर को जोड़ने वाले उस छोटे से लकड़ी के पुल पर एक ओर तुम खड़े थे, एक ओर मैं और कैसे हम दोनों ही नीचे नदी में खेलती मछलियों के झुंडों को देख रहे थे ! इस मंदिर को सुशोभित करती सुनहरे बुद्ध से भी बड़ी वह प्रतिमा कैसा मोहित कर रही थी हमें ! अच्छा, जब पांच मिनट की साधना के लिए मैंने आँखें बंद की थी, तब तुम भी एकदम ध्यान में डूब गए थे न !कैसे अपनी सुध - बुध खो बैठे थे हम ! और वह तालाब याद है तुम्हें ? वही जो मंदिर के दरवाज़े से निकलकर दो और दरवाज़ों को पार कर एक बहुत ही शांत जगह पर है ! तुम्हें ऐसी जगहें बहुत पसंद हैं, जानता हूँ - शायद इसलिए कुछ देर अकेला बैठा रहा - यह सोचकर कि अमूर्त रूप में, अप्रत्यक्ष रूप में तुम भी मेरे साथ बैठे हो !

कल मैंने तुम्हें सबसे ज़्यादा 'सस्पेंशन - ब्रिज' लांघते समय महसूस किया ! नीचे  ... काफ़ी नीचे उथली पर पत्थरों को चीरती नदी  ... हरी - नीली लहरें  ... ऊपर लोहे की रस्सियों से बँधा पुल  ... पुल पर बँधे सैकड़ों रंग - बिरंगे झंडे  ... उन झंडों पर यहाँ की लिपि में रचे मन्त्र  ... उन मन्त्रों को पूरे वेग से अपने साथ उड़ाने की कोशिश करती ठंडी बयार  ... और उस बयार में अपने छोटे बालों को उड़ाने का असफल प्रयास करते पुल के दूसरे छोर पर खड़े तुम ! उस दौरान मैंने यहाँ के हर बुद्ध से प्रार्थना की थी कि काश ! वक़्त की नब्ज़ थम जाए और इस छोटी - सी नदी पर बने इस सेतु को पार करते ही सात समुन्दर पार की दूरी मिट जाए !

आज भी तो तुम मेरे साथ ही हो - यहाँ चारों ओर पहाड़ों से घिरे, पारो शहर से दूर, इस छोटे - से सुन्दर कमरे में ! मैं खिड़की की मुंडेर पर बैठकर यह सब लिख रहा हूँ और हमेशा की तरह तुम मुझे बिना कुछ कहे बस देखे जा रहे हो ! देखना ही है तो सामने सफ़ेद चमकते पहाड़ों को भी तो देखो ! लग रहा है जैसे इस समय वहाँ बर्फ़ गिर रही है ! देखना ही है तो बाईं ओर बहती नदी को भी देखो ! देखो, कैसे रास्ते में आते हर छोटे - बड़े पत्थर पर पानी उछल - उछलकर बिखर रहा है ! देखना ही है तो देखो - कैसे मैं कहीं भी आऊँ, कहीं भी जाऊँ तो कैसे तुम्हारी स्मृति मेरी तड़प बन जाती है ! 

एक बात बताना जब भी फ़ुर्सत मिले ! क्या कभी तुमने भी मुझे महसूस किया है यूँ ही, गाहे - बगाहे ?





Saturday, 25 August 2018


Annihilation


Reminiscences from my diary

Aug 19, 2018
Sunday, 02:00 AM
In Flight to Kuala Lumpur


एक समय आता है, जब -
रेशों में वजह - बेवजह पलता
दर्द
पशमीने - सा हो जाता है !
रेशे - रेशे को -
- कैवल्य मिल जाता है, तब !

***

एक समय आता है, जब -
पीड़ा की वाणी -
- सिंधु - सी हो जाती है !
शांत होते हुए भी -
एक बड़वानल पलता है, तब !
एक झंझानल पलता है, तब !

***

एक समय आता है, जब -
वेदनाओं का समूह
रचता है प्रपंच, इंद्र सा !
किसी राम की प्रतीक्षा में
हृदय
अहिल्या हो जाता है, तब !

***

एक समय आता है, जब -
नाड़ी - संहिता में यहाँ - वहाँ बिखरी -
टीस
लहू क साथ छोड़
आँखों में पलते नीर से जा मिलती है !
अनवरत बरसात होती है, तब !





Monday, 30 July 2018

Existence yet unanswered!



Reminiscences from my diary

July 30, 2018
Monday 08:00 pm
Murugeshpalya, Bangalore


कभी - कभी मेरा मानस - हंस
उड़ते - उड़ते
सात आसमानों के पार
एक ऐसे क्षितिज को स्पर्श कर जाता है
जहाँ मैं सोचने लग जाता हूँ कि -
क्या मेरे अस्तित्व का यथार्थ होना -
- अवश्यम्भावी था ?

...पर फिर सोचता हूँ कि
क्या ऐसा सोचना
नियति पर प्रश्नचिह्न लगाना नहीं है ?
नियति, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड -
मेरे लिए -
एक दूसरे के पर्याय ही तो हैं
और मेरे आराध्य भी !

तो क्या आराध्य पर प्रश्नारोपण किया जा सकता है ?
शायद नहीं
या फिर
शायद हाँ !
हाँ, शायद, अगर आराध्य मूक हो
या फिर
गहन मित्र
या फिर
एक मूक मित्र !

आराध्य ने शंख फूँका
संज्ञा संचारित हुई
अणु को सत्ता मिली
पर क्यों, ये सत्ता -
ये अस्तित्व -
जो पाषाण - सा था
और आद्यांत तक
पाषाण - सा ही रह सकता था
समय के साथ -
सलिल बन गया !
जहाँ जो मार्ग दिखा, वही अपना लिया !

सोचता हूँ -
ऐसी श्वास भी क्या श्वास
जो
नियति, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड से न लड़े !
जो
अपने मूक मित्र को न झकझोरे !
जो
अनगढ़ नीर के सामने हिमालय - सी न डटी रहे !

खैर  ...
कोई तो ऐसा चित्रगुप्त होगा
कोई नियति - प्रबंधक
जिसके बही - खातों में
खंड - खंड ही सही
तार तार ही सही
मेरे प्रश्नों के
उत्तर तो होंगे !









Monday, 23 July 2018

...that road to Thimphu



Reminiscences from my diary

March 30, 2018 Friday
10:00 AM
Damchoe's Home-stay
Thimphu, Bhutan


दो उँगलियों के बीच से -
बादल को फिसलते देखा  ...
और फिर कुछ देर बाद -
कोहरे को टकराते देखा  ...
और उसके कुछ देर बाद -
उन्हीं दो उँगलियों के बीच से -
बादल और धुंध - दोनों को ही - भागते देखा !

अजीब लगा पहले  ...
बादल तो ऊपर होते हैं -
आसमान में !
तो फिर मेरी उँगलियों ने -
- इन्हें कैसे छुआ ?
सोच ही रहा था, तभी -
- सलिल बरस पड़ा  ... ज़ोर से !
रह नहीं पाता यह भी -
- मेरे बिना !
जहाँ पहुँचता हूँ -
- पीछे - पीछे आ जाता है !

कुछ देर मूसलाधार बरसात होती रही  ...
इतनी-
- कि लगा, मानो -
आज नीर में ही -
वायु, अग्नि, पृथ्वी और नभ -
सब समा जाएँगे !

हाथ गाड़ी के शीशे से बाहर था !
वे दो उँगलियाँ ही नहीं, पूरा हाथ ही -
जम गया था -
ठण्ड से -
हवा से -
पानी से -
और फिर ओलों से !
भूटान केओले - हेलस्टोन्स !
पता नहीं, क्या कहते हैं इन्हें -
- यहाँ की भाषा में ?

उस एक घंटे में लगा, मानो -
भूटान ने अपने सभी रंगों से -
मौसम के हर मिजाज़ से -
स्वागत किया हो -
मेरा  ...
और मेरे साथ -
मुझमें कहीं खोए -
तुम्हारा !


Saturday, 16 June 2018

The leftovers!

Reminiscences from my diary

June 16, 2018
Saturday 10:15 pm
Murugeshpalya, Bangalore


जब कोई अपना -
कोई बहुत अपना -
जैसे -
भाई , बहन , दोस्त , हमदर्द -
- घर छोड़कर हमेशा के लिए कहीं दूर चला जाता है -
तो -
खुद को -
खुद की कितनी ही चीज़ों में -
छोड़ जाता है !

चीज़ें, जैसे -
स्याही से सूखा पेन
बैंकों से आई चिट्ठियाँ
हस्ताक्षर किए दस्तावेज़
बटन टूटी बुशर्ट
जूते की पालिश
टूटी चप्पल
मुड़ी - तुड़ी पासपोर्ट साइज़ फोटो
किसी सुन्दर जगह से खरीदा कोई पोस्टकार्ड
एक खोया मौजा
टेबल लैंप का फ्यूज़ बल्ब
कभी कभी पर्सनल डायरी भी
चीज़ें !

जब जब सफ़ाई होती है घर की
दिवाली से पहले -
किसी मेहमान के आने से पहले -
या कभी यूँ ही -
तब तब ये चीज़ें -
न जाने कहाँ कहाँ से बाहर निकल आती हैं -
हाथों से टकराती हैं -
ख्यालों के मकड़जाल बुनती हैं -
बिसरि स्मृतियों का डंक चुभोती हैं !
एक चीज़ फेंको
तो दो और निकल आती हैं
और  ...
हर चीज़ के फेंकने के साथ ही -
वह अपना -
वह बहुत अपना -
जैसे -
भाई , बहन , दोस्त , हमदर्द -
- एक बार फिर घर छोड़कर हमेशा के लिए कहीं दूर चला जाता है !