Thursday, 30 January 2014

                                           A night of words..... with words......


Reminiscences from my diary
January 10, 2014
3 A.M. Ooty



आज की शब कुछ अलग सी थी  …
कुछ सकुचाई - सी  …  कुछ अलसाई - सी  …
कुछ टूटती  …  कुछ  बिखरती  …
मानो,
शब्दों  का खंडर हो ,
और मैं , एक जोगी  …
जिसे मिल गया हो -
रात बसर करने के लिए -
एक मनचाहा सन्नाटा !

जहाँ बनती - बिगड़ती पंक्तियाँ -
- बनी थीं सेज  …
जहाँ हवा थी -
-अलंकारों से अलंकृत  …
और, छत से टपक रहा था -
-कल्पनाओं का सलिल !

जहाँ दीवार की तरेड़ों से -
- आ रही थी  …
… किसी अधूरी उमंग की -
- ढलती कसक की -
-एक-आधी रश्मि !
और,
यादों के जुगनू -
- अल्फ़ाज़ों की ईंटों से -
- गुफ्तगू कर रह थे !

कब आँख लग गयी  …
कब पहर बीत गया  ....
न मैं जान पाया ,
न  जोगी मन !
सुबह तकिये के पास -
ठण्ड से -
-एक कविता कांप रही थी !

Wednesday, 25 December 2013

You were there....You still are! 

Reminiscences from my diary
December 14, 2013 Saturday
5 p.m. 

In train to Delhi ....will meet Sharan tonight after 2.5 years..and my babus and bhaia, tomorrow!


यूँ तो , वैसे भी -
तेरी सुध कभी बिसरी ही नहीं,
पर आज -
खबर सुनते ही -
तेरे आने की -
लगा,
साज़ों में छिपी सरगम -
बौरा गयी हो
और कर दिया हर दिशा को -
-गुंजायमान !

घुल गयी हवा में -
गुंजन  …
बिखर गए, चहुँ ओर -
सुन्दर रंग !

शीशे पर नज़र पड़ी ,
तो आज का अक्स -
-मुस्कुराता दिखायी दिया !

यूँ तो , वैसे भी -
तेरी सुध कभी बिसरी ही नहीं ,
पर आज -
किवाड़ों को बंद करने की -
कोशिश करती चटकनी -
खुल गयी!
बिखरे बिम्ब -
सजीव - से हो उठे -
और,
एक बार फिर -
सिमटने के लिए -
-तड़पने लगे !
काली रात के सफ़ेद तारे ,
हरी घास के लाल फूल ,
नीले सलिल की पीली मछलियां -
सब -
जश्न मनाते से लगे !

एक बार फिर -
आँखों में-
मानस में -
रूह में -
समय की परिधि में भी -
तू उतर आया -
-और
पहले से ही बसे 'तू' में
समा गया !

यूँ तो , वैसे भी -
तेरी सुध कभी बिसरी ही नहीं -
पर आज  … !!



Saturday, 9 November 2013

In thee...

Reminiscences from my diary
November 4, 2013
6 P.M. Bangalore


अक्सर  सोचा करता हूँ -
कैसे तुझे मैं पा जाऊं !
न तेरे पास , न तेरे साथ
मैं तो तुझमें ही -
रहना चाहता हूँ !

चले तू जिस भी राह पर ,
बरगद की छाया बन -
तेरा सुकून पाना चाहता हूँ !
और,
अगर हो -
बंजर मरुस्थल ,
किसी शाद्वल को ढूंढती -
तेरी नज़र बनना चाहता हूँ !
यदि,
मरीचिका के छलावे में -
आ जाये, तू कभी -
तब तेरी तृष्णा जो खोजे-
- वो सलिल बनना चाहता हूँ !

चुने अगर  कोई  नज़्म तू , कभी ,
गुनगुनाने के लिए -
तो उस नज़्म के अक्षर बन -
तेरे होठों पर थिरकना चाहता हूँ !
और,
गाते-गाते
अगर बिगड़ जाये लय -
तो सुरों को पिरोता, संजोता ,
कोई राग बनना चाहता हूँ !

 जब कोई रात बुने -
मसरूफ़ियत से -
तेरी आँखों में नींद का जाल ...
तब एक सुन्दर सपना बन -
उस जाल में, सितारे की तरह -
पिरना चाहता हूँ !
और,
अलसाये से दिन में, कभी,
लग जाये अगर  आँख ,
तब, तेरे कमरे की  दीवार पर -
ढलती धूप बन -
तेरी झपकी में ,
घुलना चाहता हूँ  !

किसी शाम , जब तू,
लौट रहा हो घर ,
और, बादलों ने रचाया हो -
षड़यंत्र कोई -
तब,
तेरे चेहरे से -
धीरे - धीरे सरकती -
बारिश की -
पहली बूँद  बनना चाहता हूँ!

किसी वीरान बीहड़ कानन में -
बौराये मृग सा-
स्वयं को ढूँढता -
कभी तू  चीखे , तड़पे -
तो तेरी नाभि में छिपी -
कस्तूरी बनना चाहता हूँ !
और,
समय की सीमा -
- जब हो समीप,
तब तेरे अक्स में मिलकर -
मोक्ष पाना चाहता हूँ !




Sunday, 3 November 2013

                                                    A NIGHT ...FORLORN!

Reminiscences from my diary
November 01, 2013
1 A.M.
Murugeshpalya, Bangalore

सितम्बर के मौसम की  …
जाते सावन के सलिल से सीली  …
हल्की सर्द रात  …
आँख खुल गयी अचानक -
दो बजे थे  … शायद !
सामने खिड़की पर लगे पर्दे -
और पर्दों पर छपे -
हल्के गुलाबी फूल -
हवा के साथ ,
उड़ने के लिए -
तड़प रहे थे !
पर्दे के पीछे की जाली पर -
पड़ गयी नज़र -
लगा , तू है -
'उन ' हमेशाओं की तरह !
पर फिर लगा , नहीं  …
तू नहीं है -
'इन' हमेशाओं की तरह !

आँखें अभी भी अधमुंदी थी -
और,
यादों के किवाड़ -
खड़क रहे थे -
हवा के साथ -
कभी खुल रहे थे ,
कभी बंद  हो रहे थे !
न जाने कैसी स्मृतियाँ थीं -
और कैसा था उनका जाल -
इस पहर में भी ,
गांठें कसी रहीं !

बाहर अभी भी -
हवा सांय सांय कर रही थी  …
मानो,
इस हल्की सर्द रात में -
ठिठुर रही हो!

मानस , अभी -
तेरी यादों की गलियों से गुज़रता -
किसी नुक्कड़ पर -
आराम करने के लिए ,
ज़रा ठहरा -
तो किसी की बात याद आ गयी !
किस 'किसी' की - याद नहीं आया ,
पर, उस 'किसी' ने कहा था -
यादें अमृत सी होती हैं !
पर  …
ये कैसा अख़लास था -
जो इस पहर के इस क्षण में -
मुझे नीलकंठ बना रहा था !

खिड़की से हटाकर ,
एक नज़र कमरे पर डाली -
दीवार की हर खूँटी पर -
तेरी यादों के ढेर टंगे दिखायी दिए !
कमरे में अँधेरा था !
पता नहीं चल रहा था -
कौन सी याद ,
कौन सी गली ,
कौन सा नुक्कड़ -
किस खूँटी पर था !

ऐसे ही कुछ देर  …
अँधेरे से गुफ्तगू करता रहा -
और जब ऊब गया ,
तो,  फिर से  …
खिड़की की ओर देखने लगा !
सोचा था -
कोई गली तो बंद मिलेगी !
कहीं तो अंत होगा !
पर , न  … तू  …  तुझसे परिभाषित पल -
अनंत - व्योम से !
अविरल - सलिल से !
अन्तर्निहित - संज्ञा से !!

Saturday, 2 November 2013

THAT ANOTHER DAY..!!

Reminiscences from my Diary
October 29, 2013
11:30 P.M.
Murugeshpalya, Bangalore


आज एक बार फिर -
सूर्य का सृजन हुआ !
आज फिर ,  एक चाँद -
- फीका पड़ गया !
कोहरे के झीने कपडे से -
- चेहरा छुपाये ,
आसमान ने -
- लूट लिया निशा का घूंघट  …
… और ,
झड़ गए सभी सितारे !

बिना मेघदूत के ही आज -
- रश्मियों की धूल  उड़ाता -
चल दिया बादलों का कारवां !
सलिल के घड़े , आज फिर ,
टूटते - टूटते रह गए !
धूप के जूनून से -
परछाइओं की काया झुलस गयी !
समय का अर्जुन -
युगों के रथ पर सवार -
आज फिर, कृष्ण की बाट जोहता रहा !
इतिहास का मेहमान ,
चौके से -
- भूखा ही उठ गया !
आँख की कोर में ,
नमी -
- ठहरी ही रही !
आज भी पुरवाई -
अपनी दिशा -
- खोजती रही !

ढलती धूप के कहार ,
फिर से ,
संध्या की डोली लेने निकल पड़े !
आज फिर ,
अपने नीड़ को जाती गौरैया -
- चहचहाना भूल गयी !
आज फिर,
अपने घर को जाती सुंदरिया के -
- गले में बंधी  घंटी -
- नहीं बजी !
शामें नीरव थीं-
आज भी , नीरव ही रही !

और,
धीरे - धीरे  …
थोड़ी हिम्मत करता ,
थोडा घबराता ,
सकुचाता -
चीड़ के ठूंठों से -
फिर झाँकने लगा -
एक और चाँद!


Friday, 19 April 2013

THE UBIQUITOUS YOU.....     for you, bhai..


 
REMINISCENCES FROM MY DIARY.....
November 23, 2012
11:15 P.M.
750, IISc
 
 
वह खुली आँखों से बुनी कल्पना है ,
वह काल का यथार्थ भी !
वह  'मेघदूत' का बादल है ,
वह शिवानी की 'कृष्णकली ' भी !
वह पन्नों में दबा अनकहा इतिहास है ,
वह सपनों से सजता भविष्य भी !
वह चंद्रशेखर का सौंदर्य है ,
वही शिव का तांडव भी !
कभी मस्जिद से आती अजान की आवाज़ है वह ,
वही मंदिर का शंख भी !
वह माँ की लोरी में छिपा वात्सल्य है ,
वही अल्हड़ उन्स भी !
मिलन की मुस्कान है वह ,
वही विरह का आंसू भी !
वह पहली बरखा की खुशबू है ,
वह चटकती कलि का सौरभ भी !
वह बचपन की नाव है कागज़ की ,
वह झुर्रियों की लाठी भी !
वह कृष्ण है , वह स्वाति भी ,
वह इन्द्रधनुष को सजाती तूलिका भी !
वह मेघ - मल्हार पुरवाई सावन की ,
वह पतझड़ का ठूंठ भी !
वह बेरहम दुआ है , अनसुनी सदा है ,
वही अधूरी कविता भी !
वह सुर है , राग है , स्पंदन है, जीवन है ,
वह सत्य , शिव , और सुन्दर भी !
वह अग्नि का ताप है ,
वह पृथ्वी का धीर भी !
वह हवा , वही आकाश ,
वह शांत - विकराल सलिल भी ..!
 रश्मियों से बुनी धूप है वह ,
वह अलसाई - सी शाम भी !
 
जितना सोचता हूँ -
उतना पाता हूँ -
"वह" - न पास, न साथ -
"वह" तो मुझ में ही है कहीं -
श्वास की तरह ...
संज्ञा की तरह ...
अस्तित्व की तरह ....!!!
 
 
 
 
 
 
 
 

Sunday, 14 April 2013

 THE MYSTIC PANORAMA...



Reminiscences from my diary

December 3, 2012
 11:15 p.m.
750, IISc


काफ़ी वक़्त बीत गया था ...
पर , वक़्त ही नहीं मिल पा रहा था कि -
- उस पिटारे को खोलूँ -
टटोलूं -
धूल चढ़ती जा रही थी , वक़्त की ही -
उस पर ...!
पर ... आज ...
वक़्त ने मौका दे ही दिया ,
अनजाने में ही सही ...
और ,
मेरे हाथ से वह पिटारा छूट गया ,
और ,
उस पिटारे का सभी सामान -
बिखर गया छन से !
झीनी - सी रोशनी -
- छिपी हुई थी उस में -
भोर की रोशनी -
कुछ पीली ... कुछ लाल ...
पेड़ों से छनकर आती ,
और आँखों में समां जाती !
बीच में बिखरे हुए थे ,
कुछ अल्फ़ाज़ ...
शायद किसी बेतक़ल्लुफ़ नज़्म से टूटे थे ,
या फिर -
किसी मुक्तक छंद में पिरने की राह देख रहे थे !
दो - तीन अम्बियाँ भी थीं ,
शायद कच्ची , या ,
अधपकी -
जो कभी ,
निदाघ की दोपहरी में -
आम की कोटर में छिपाई थीं !
साथ ही बंद पिटारे से ,
आज़ाद हो गयी -
- संदली - सी महक़ !
 शायद सुर्ख़ - से , सूखे - से फूलों की थी ,
कौन -से फूल थे , याद नहीं ,
पर थी बहुत जानी - पहचानी - सी !
महक के साथ ही -
रु -ब- रु हो गया उस बेचैनी से -
जो कई ज़मानों से कैद थी -
इस सुन्दर पिटारे में !
पर कैसी बेचैनी थी , किस के लिए थी ,
न तब पता था , न ही आज पता है !
कुछ कागज़ के टुकड़े भी थे -
शायद चिट्ठियों के फटे लिफ़ाफ़े थे -
हवा के साथ इधर उधर उड़ रहे थे !
एक - दो पर कुछ निशान से दिखे !
एक टुकड़ा उठाकर कुछ टटोलना चाहा ,
पर , समय की नदी में वह स्याही बह गयी थी !
एक साया भी छिपा हुआ था उसमें मुद्दत से ,
आज वह भी सामने आ गया ,
लम्बा , पतला , चिर - परिचित - सा ...
उसके बाहर आते ही ,
साया साया - सा ये समां हो गया ,
और फिर,
धीरे - धीरे ,
वह साया ही मेरा आसमाँ हो गया ...!!!