Thursday, 7 March 2013

ZINDAGI ROCKS......(3)

Reminiscences from my diary

January 19, 2012
 10p.m.
750, IISc


जाते सूरज की मद्धिम पड़ती लालिमा में छत पर खड़ा अक्सर सोचता हूँ कि कैसे ज़िन्दगी सरलता से पानी की तरह अपने रास्ते चुन लेती है ! पर क्या हमारे लिए भी यह उतना ही सरल है ? जब अचानक ही कोई अपना ... कोई बहुत अपना  ...कोई आपके प्रतिबिम्ब - सा , आपको परिभाषित करने वाला आपसे दूर हो जाता है , तो लगता है मानो ज़िन्दगी रुक जाएगी पर ... ज़िन्दगी किसी के लिए नहीं रुकती - बस ... जीने के मायने बदल जाते हैं , जीने की वजह बदल जाती है । कितनी अजीब है ये ज़िन्दगी - कब किस के लिए जीना शुरू कर देती है और कब किसको भुला देती है - कोई नहीं जान पाता ! जिसके बिना एक पल भी आगे नहीं सरकता था , उसके बिना ही ज़िन्दगी भागने लग जाती है ।

पर यहाँ भी इसकी शरारत कहाँ समाप्त होती है ! शरारती ज़िन्दगी ! न श्याम , न श्वेत ! पर ज़िन्दगी को दोष देना क्या सही है ? शायद नहीं ... क्योंकि  इसने कभी हमसे वादा नहीं किया था ; कहा तो आपके , हमारे उस अपने ने था कि वह सदा आपके साथ रहेगा ; वादा किया था अपनों ने , लोगों ने , ज़िन्दगी ने नहीं कि परछाई - से साथ रहेंगे - तो फिर ज़िन्दगी से शिकायत क्यों ? पर हम उन लोगों से , उन प्रतिबिम्बों से भी कहाँ कुछ कह पाते हैं ! शायद इसलिए क्योंकि ज़िन्दगी का ताना बाना इन्हीं झूठे वादों से बुना जाता है - मानता हूँ की महीन है , कच्चा भी ... पर सुन्दर है , बहुत सुन्दर । और इस सौंदर्य का सोपान करने के इतने आदि हो जाते हैं हूँ कि इन मिथ्या रंगों के बिना यथार्थ ही नष्ट हो जाये ! कई बार यह ख्याल गहरा जाता है कि क्या होगा जब ये कच्चे धागे तार - तार हो जायेंगे । क्या तब यह अस्तित्व बिखर नहीं जायेगा ! पर तभी आसमान में उड़ती पतंग अचानक कटकर पड़ोस के उन नन्हे हाथों में गिरती है और उन नन्हे - पतले होठों पर एक अलौकिक - सी मुस्कान बिखर जाती है - मुझे भी अपनी दुविधा का समाधान मिल जाता है - वास्तव में उन झूठे , टूटते ... बनते ... बिखरते ... गहराते ... छनते  वादों में ही ज़िन्दगी छिपी रहती है ! 
 इन्हें जी लो , ज़िन्दगी मिल जाएगी !!


                                                                                                               ... to be contd.






 

Tuesday, 5 March 2013

ZINDAGI ROCKS......(2)

Reminiscences from my diary

January 17, 2012
6 p.m.
750, IISc

... दूर गिरते किसी झरने से जैसे पानी की छींटें मुख पर पड़ती हैं और हम सोचते रह जाते हैं कि यह पानी कहाँ से आया ; उसी प्रकार जब कभी किसी राह या किसी मोड़ पर जवाब से टकराते हैं तो  हम उसे नहीं पहचान पाते  और अंत में रह जाती है उलझती - सुलझती- सी ज़िन्दगी की पहेली ।
जब कभी पतझड़ में गोधूलि के समय एकाकी - सी सड़क पर एकाकी चलता हूँ तो मन कई बार पूछता है , शिकायत करता है - क्या ज़िन्दगी दो पल के लिए भी हमसफ़र नहीं बन सकती थी । पर मेधा धिक्कारती है मन को और शब्द प्रहार करती है कि क्या तुम कभी ज़िन्दगी के साथ चल पाए ! वाकई , क्या मैंने ज़िन्दगी के सूनेपन में रस घोलने का प्रयास किया ! क्या रस- वितान ज़िन्दगी के ठूंठ को संज्ञा के रस से सींचकर हरीतिमा विस्तृत करने का प्रयास किया ! नहीं किया ! तो फिर, ज़िन्दगी से शिकायत क्यों ! शिकायत तो स्वयं से होनी चाहिए । पर शायद उदासीनता की चादर इतनी गहन हो चुकी है कि खुद से शिकायत करने का भी अवसर नहीं मिलता ।
पतझड़ के मौसम में उन्ही सूनी राहों पर चलते चलते जब उदासीनता की चादर में कुछ सिलवटें आ जाती हैं और इसके महीन ताने - बाने से थोड़ी - सी हवा , थोड़ी सी रोशनी छन छन के शरीर को छूती है , तो अनायास ही मानस पटल पर कुछ खोई कल्पनाएँ जीवंत हो जाती हैं ।
लगता है मानो सावन की संध्या में, जब बयार हो कुछ गीली, कुछ बौराई सी ; जब सुन्दर - सी , नैसर्गिक - सी शांति हो चहुँ ओर और बीच बीच में कहीं दूर से कोई कोयल प्रयास करती हो इस नैसर्गिक शांति को भंग करने का पर जुड़ जाते हों सुर के तार उस कूक से ; जब नीचे बहती हो पतित - पाविनी , शस्य - श्यामला गंगा जिसकी सवारी करते हों फूल , कंकण , सिन्दूर , नारियल, दुर्गा और छोटे बच्चे और मैं खड़ा हूँ हावड़ा के पुल पर - निर्निमेष , आलोकित , एकांत !
सोचते - सोचते अचानक ही यह कल्पना और ऐसी कई कल्पनाएँ कब शून्य में विलीन हो जाती हैं , पता ही नहीं चलता । रह जाता है तो बस शुष्क - सा यथार्थ , शुष्क - सी ज़िन्दगी ।


                                                                                                               .... to be contd.




Wednesday, 13 February 2013

ZINDAGI ROCKS......(1)

Reminiscences from my diary

January 14, 2012
12:15 a.m.
750, IISc

अक्सर सोचता हूँ ज़िन्दगी कौन है ; क्या है ! शिक्षक है या विद्यार्थी ! कभी लगता है ज़िन्दगी बहुत कुछ सीखती है तो कभी पाता हूँ कि ज़िन्दगी बहुत कुछ सिखाती भी है। कभी हम ज़िन्दगी को हंसाते हैं तो कभी ज़िन्दगी हमें हंसाने की कोशिश करती है। कभी शरारत , कभी हंसी , कभी ठिठोली , कभी उत्साह , कभी उमंग , कभी विश्वास - न जाने कितने ही रंगों का तानाबाना ज़िन्दगी हमारे इर्द-गिर्द बुनती है और बुनते - बुनते अनायास ही अपने जाल में उलझ जाती है। कभी - कभी तितली की तरह यह हमें भगाती है , तो कभी मधु -मक्खी की तरह हमारे पीछे भागती है। भागने - भगाने के इस सिलसिले में न जाने कितने ही चेहरे अपने हो जाते हैं ; कितने ही अनजान लोगों से मुलाक़ात होती है ; कोई नहीं मिल पाता है तो खुद अपना अस्तित्व ; अपना चेहरा । सच ! सिर्फ पहेली की तरह इसे सोचा जा सकता है । हवा के झोंके - सी है ज़िन्दगी । रोकना चाहें तो भी नहीं रोक सकते हैं।
कभी - कभी ज़िन्दगी भीड़  में गुम - सी हो जाती है तो कभी - कभी अकेली वीरान -सी होकर , हमें भी अकेला कर जाती है । हाँ ! जब कभी अकेलापन घेर लेता है , तो ज़िन्दगी ही कभी कैनवास , ब्रश, रंग , तो कभी कागज़ और कलम थमा देती है हाथ में - इन सब से ज़िन्दगी की अलग - अलग सूरतें उभरती जाती हैं और अकेलापन ! दूर घर के किसी कोने में छुप जाता है - फिर कभी लौट कर आने के लिए ।
पर जब भी कुछ कर जाती है ये ज़िन्दगी, तो मन अक्सर बस किंकर्तव्य विमूढ़ - सा होकर रह जाता है और मन का मानस सोचता है कि यूँ होता तो क्या होता! और जवाब ... जवाब ढूंढते - ढूंढते हम न जाने कितनी ही राहें , कितने ही नुक्कड़ , कितने ही झरोखे पार कर जाते हैं। पर जवाब , न ... यही तो इस ज़िन्दगी की शरारत है - ज़हन में बस सवाल छोड़ जाती है और इस सवाल के रूप में सताती रहती है ; पर फिर सोचता हूँ कि ज़िन्दगी खुद भी जवाब जानती है ! न ... नहीं ! अगर जानती तो दर-दर न भटकती।

.... to be continued!



Thursday, 24 January 2013

The First Hindi Lines I fall in Love With....

 

REMINISCENCES FROM MY DIARY....

August 18, 2011

12:15 A.M., GFC, IISc 

 

ऋतु वसंत का सुप्रभात था ,

मंद- मंद था अनिल बह रहा।

बालारुण की मृदु किरणे थीं।

अगल- बगल स्वर्णाभ शिखर थे।

एक- दूसरे से विरहित हो,

अलग- अलग रहकर ही जिनको,

सारी रात बितानी होती,

निशा काल से चिर अभिशापित,

बेबस उस चकवा- चकवी का,

बंद हुआ क्रंदन , फिर उनमें ..

उस महान सरवर के तीरे ...

शैवालों की हरी दरी पर,

प्रणय- कलह छिड़ते देखा है।

बादल को घिरते देखा है। 

 कहाँ गया धनपति कुबेर वह ..

कहाँ गयी उसकी वह अल्का ?

नहीं ठिकाना कालिदास के,

व्योम प्रवाहित गंगाजल का।

ढूँढा बहुत  किन्तु लगा क्या-

-मेघदूत का पता कहीं पर।

कौन बताये वह छायामय,

बरस पड़ा होगा न यहीं पर।

जाने दो , वह कवि कल्पित था।

मैंने तो भीषण जाड़ों में,

नभ चुम्बी कैलाश शीर्ष पर,

महामेघ को झंझानिल से,

गरज- गरज भिड़ते देखा है।

बादल को घिरते देखा है। 

 

Wednesday, 26 September 2012

 The Eternal Quest...

 

REMINISCENCES FROM MY DIARY....

July 7, 2012

12:15 A.M., 750, IISc

 

अक्सर ,
उस अनजान शख्सियत का ,
चेहरा 
खोजने की कोशिश करता हूँ ,
जो ,
मन और मानस में फैली-
धुंध में ,
गुम - सा रहता है -
कभी गुनगुनाते लब्ज़ों में ,
किसी अधलिखी कविता में ,
खुद और खुदा से होती गुफ़्तगू में ,
या फिर ,
इस पार से उस पार को जोड़ती ,
किसी कहानी में ।

कभी - कभी 
पलंग पर लेटे - लेटे ,
आकृति में ढालने की कोशिश करता हूँ , उसे ,
दीवार पर पड़ी -
आड़ी - तिरछी दरारों में ,
या फिर, 
हवा के साथ मचलते - इठलाते -
नीले - काले बादल के टुकड़ों में ।

कभी लगता है , वह 
शायद शिवानी के किसी उपन्यास के -
- नायक - सा है ;
या फिर -
मुंशीजी के किसी -
- बेबस किरदार - सा ।

यूँ ही सहसा कभी लग जाता है ,
मानो उसने पुकारा हो -
मन मचलने लग जाता है -
क्या पता -
आवाज़ पहचान कर ,
चेहरा भी पहचान पाऊँ !
इसलिए ,
चेहरे के साथ - साथ -
आवाज़ खोजना शुरू कर देता हूँ । 

कभी लगता है ,
नवजात शिशु की किलकारी - सी है 
या फिर ,
कलकत्ते की किसी व्यस्त सड़क के -
- कोलाहल में दबी कोई एक ।
हो सकता है,
गुरद्वारे की गुरबानी में छिपी हो ;
या,
किसी घने गीले जंगल में जुगनुओं की -
-झंकार में ।

पर अंत में ,
हताश - निराश हो जाता हूँ ,
जब ढूँढते  - ढूंढते विफल हो जाता हूँ।
न आँखें कुछ खोज पाती हैं , न कान !
न चेहरा मिल पाता  है, न ही आवाज़ !
और इस तरह ,
उस मूक निराकार के साथ -
आँख मिचौनी खेलता रहता हूँ ।
कभी तो ऐसा होगा ,
जब ऐसी ही धुंध होगी ,
और, 
ढूँढने की बारी -
- " उसकी " होगी ।

  Mist...Fog....Enigma....!!

 

REMINISCENCES FROM MY DIARY....

October 17, 2010 

9 P.M., A 118, Thapar, Patiala              


(Its Dussehra today. I, Gaurav babu, Geeta, Khushboo, Alisha, Manasvi and astonishingly Sharan went on a small evening temple trip and captured some of the wonderful moments for the lifetime...)

 

समझ नहीं पा रहा हूँ ,
क्यों आज ,
चारु चन्द्र की दूधिया चांदनी 
मटमैली - सी लग रही है ...!
आज शायद बिन मौसम की धुंध चारों ओर -
- पसरी पड़ी है ....

क्या वहाँ दूर ...
दूर , ' मामा ' के आगे,
किसी काले मेघ का पहरा है ?
या फिर ,
आज शायद ,
निशा की कालिमा जीत गयी ...
.... और, हार गयीं वे उज्ज्वल रश्मियाँ !
या फिर ,
शायद मैं ही ...
...मेरी आँखें ही धुंधली - सी पड़  गयी हैं ...
क्योंकि, 
आज शायद बिन मौसम की धुंध चारों ओर -
- पसरी पड़ी है ....

हाँ ! धुंध , कुछ मटमैली - सी ...

याद आ गया अनायास ही ,
घर के बाहर ,
चबूतरे पर बैठी ,
उस  बूढ़ी पापड़ वाली का-
- फटा मटमैला आँचल ।
और,
मटमैली ओढ़नी उस नन्ही बच्ची की ,
जो मिली थी एक सफ़र में ....
हमसफ़र - सी बनी ।

सोच ही रहा था ...
कि साथ ही दस्तक दे गया ,
एक धुंधला  चेहरा ,
चेहरा उस अजनबी - से दोस्त  का ,
जो कभी अपना - सा बना गया था ,
एक पराये मुल्क में ....!

और फिर ...
पीछे - पीछे आ गयी ...
एक और परछाई ,
श्याम -  श्वेत - सी ...
श्याम ज़्यादा ,  श्वेत कम ...
परछाई उस बूढ़े की ,
जो शैशव से मेरा मित्र था,
मेरा सर्वस्व ...!

और फिर ...
कुछ ही पलों में ,
न जाने कहाँ से ,
आँखों के आगे छा गया ,
संगम की गंगा का धुंधला पानी ,
और,
पानी में तैरती एक धुंधली - सी नाव ।
न जाने कब वह नाव ले गयी मुझे ,
उसी पसरी धुंध में खोये देवदार के जंगलों में ,
जहाँ दिखाई तो दे रहा था ,
पर फिर से ,
धुंधला धुंधला - सा ...!
धुंधले - से पत्ते ...
धुंधले - से जुगनू ...
और,
धुंधली - सी उनकी जगमगाहट ....!

न,
कुछ तो है ...
कुछ तो ज़रूर ...
शायद,
मानस पटल किसी की दस्तक की 
राह देख रहा है ...
या फिर,
मन यूँ ही ,
किंकर्तव्यव विमूढ़ - सा,
अन्यमनस्क - सा होकर ,
खोना चाहता है ,
किसी ऐसे ही धुंधलके में ....

और,
शायद इसीलिए 
लग रही है आज,
शुभ्र चन्द्रिका भी ,
मटमैली - सी ...
क्योंकि, 
आज शायद बिन मौसम की धुंध चारों ओर -
- पसरी पड़ी है ....!!



Saturday, 1 September 2012

THE DECEPTIONS, EXQUISITE...!

REMINISCENCES FROM MY DIARY.....

July 06, 2009
Monday, 11:05 p.m.
Hostel H, Thapar
Patiala


कुछ ताने-बाने ....कभी-कभी ,
अनसुलझे से ही रह जाते हैं!
क्यों कभी- कभी,
तारों की महफ़िल में भी
चाँद
यूँ ही तन्हा - सा रह जाता है।

सुलझते-सुलझते ही
क्यों कुछ ताने-बाने ,
बीच में ही -
उलझ से जाते हैं !
तभी तो,
झिंगुरों की झंकार में -
खुद झिंगुर ही
उलझकर रह जाता है।

तार - तार होने पर भी
क्यों कभी कभी -
एक ताना - बाना
दुसरे - से
और
दूसरा
तीसरे-से
अनायास ही जुड़ जाता है।
हाँ!
शायद  इसीलिए
आसमान में उडती
पतंगें
और,
उनकी डोर
यूँ ही -
बिना वजह -
उलझ सी जाती हैं।

और,
कभी - कभी ..
कहीं - कहीं ..
दहकती आग के बीच
कहीं-
कोई पतंगा
उड़कर भी नहीं उड़ पाता है।

वहीँ दूसरी ओर
जानकर भी -
अनजान बनता
भंवरा -
खिले - अधखिले कमलों के जाल में
खुद को
उलझा - सा जाता है।

वाकई ,
कितने अजीब होते हैं -               
कुछ जाल ..
कुछ ताने - बाने ..
कभी सुलझे - से 
और,
कभी - कभी ,
कुछ उलझे - उलझे से .....!!!