Monday, 28 December 2020
Wednesday, 9 December 2020
Thursday, 3 December 2020
Sounds at 2 AM
Reminiscences from my diary
Nov 30, 2020
Reminiscences from my diary
Monday, 2.15 am
Murugeshpalya, Bangalore
इस एक पल -
अचानक ही घड़ी पर नज़र पड़ गयी!
रात के दो बज गए हैं!
ओह!
दो!
यह तो बहुत कम समय रह गया भोर होने में!
पर नींद?
उफ्फ़!
ज़रूर आते - आते नींद की कहीं आँख लग गयी है!
इस एक पल -
सन्नाटा पसरा हुआ है!
नीरव!
नीरस!
निर्जन!
हालांकि -
मुझे महज़ दो आवाज़ें -
साफ - साफ सुनाई दे रही हैं!
एक आवाज़ तो अपनी साँस की ही है!
मुद्दत बाद गौर कर रहा हूँ कि -
कैसे मेरी साँस -
अंदर - बाहर
आते - जाते
शोर मचा रही है!
"मैं भी हूँ, मैं भी हूँ.."
"जानता हूँ रे! तभी तो मैं हूँ!"
दूसरी आवाज़ -
झींगुरों की है!
दो हैं?
दस हैं?
या फिर तारे जितने?
पता नहीं!
और -
यह भी नहीं पता कि -
असल में -
है कहाँ यह टोली!
कमरे में तो नहीं है!
ज़रूर बाल्कनी में -
मनी-प्लांट
या ऐलोवीरा
या फिर निम्बोली के आस - पास कहीं -
झनक रहे हैं!
खैर ..
इस एक पल -
यही दो आवाज़ें हैं !
हाँ!
बस दो!
बाकी तो बस वही -
सन्नाटा!
मौन - मूक सन्नाटा!
अरे!
तुम भी हैरान हो गए क्या?
कहो तो!
वैसे -
मैं भी हूँ -
हैरान!
मैं खुद -
काफी देर से टटोल रहा हूँ
इधर - उधर ताके जा रहा हूँ
पर -
मेरे रतजगे में -
आज
तुम्हारी आवाज़ -
दूर - दूर तक नहीं है..!
Friday, 23 October 2020
It was your photograph!
Reminiscences from my diary
Oct 23, 2020
Friday, 07.00 pm
Saharanpur
हुआ कुछ यूँ आज कि -
मुद्दत बाद एक दोस्त ने याद किया।
मुझे हल्का - हल्का याद है कि आखिरी बार, उससे बात -
अरसा पहले फूजी की चोटी देखते हुए की थी।
अपने देश से सैकड़ों मील दूर, हम -
इत्तेफाक़न एक ही समय में एक ही दूसरी मिट्टी नाप रहे थे, हालांकि -
मिलना नहीं हो पाया था तब भी!
तो खैर, कुल मिलाकर -
इन साहब से पिछले दस सालों में -
एक मुलाकात,
और आज को मिलाकर -
कुल तीन दफ़ा बात हुई है!
बात करते करते साझा की उसने -
एक पुरानी तस्वीर!
सुंदर तस्वीर!
यह तस्वीर मेरे पास नहीं थी।
शुक्रिया कहा उसको -
बिसरी गली में ले जाने के लिए!
बातें होते होते कम हुई जा रहीं थी,
एक सवाल कौन्धा मन में तभी कि -
आज अचानक इतने वक़्त बाद कैसे याद आ गयी!
कहने लगा - तस्वीर देखी, और बस..!
मैं खुश - सा हुआ पर, अगले ही पल, हैरान!
मैं तो उस तस्वीर में हूँ भी नहीं, मैंने कहा!
उसने कुछ नहीं कहा! बस हँस दिया!
सुनो!
सुन रहे हो?
मुझे याद आ गया है।
यह तुम्हारी अपनी सबसे पसंदीदा तस्वीर थी न?
Wednesday, 22 July 2020
You could be but you!
Reminiscences from my diaryJuly 23, 2020
Thursday, 01:30 am
Murugeshpalya, Bangalore
सोचो ! अगर तुम होते -
एक दीवार
तो मैं, तुम पर
चढ़ता
उतरता
और फिर चढ़ता
एक मटमैला रंग होता !
और अगर होते तुम -
एक दरख़्त, तो ?
मैं तब बन जाता
तुम्हारी कोटर में छिपाई
निम्बोली, या
कच्चा आम, या
बचपन का कोई ग़ुम आना !
होने को तो तुम हो सकते थे -
कोई दरगाह
मैं हो जाता फिर
किसी मन्नत
किसी ख़्वाहिश
किसी ख़ुशबू में लिपटा
एक धागा !
अगर सोचूँ तुम्हें -
धूप
तो खुद को पाऊँ
तुम्हारी राख में
तुम्हारी राख से
साँस सींचती
अधबुझी आग !
और 'गर मानूँ तुम्हें -
अंजुली भर
तो मैं
तुम्हारी ओक में सिमट जाता
एक आँसू बनकर
या होकर
एक समंदर !
तुम कुछ भी हो सकते थे, बस -
सिर्फ़ तुम नहीं होना था तुम्हें !
हुआ यूँ कि -
तुम्हारे महज़ तुम होते ही
मैं मैं नहीं रहा ... !
Monday, 22 June 2020
Maurya
Reminiscences from my diary
June 23, 2020
Tuesday, 00:30 hrs
Murugeshpalya, Bangalore
याद है, कैसे वह पूरा दिन
झल्लाहट में बीता था तुम्हारा
और तुम्हें देख - देख मेरा ?
तकदीर दिन की ख़राब थी या तुम्हारी -
आज भी बूझता हूँ जब सोचता हूँ ...
उस दिन इतने सालों में
पहली बार
तुम्हारा गुस्सा देखा
कैसे तुम्हें भरे ऑडिटोरियम में
बाहर निकल जाने को कहा गया था !
कैसे तुम पैर पटककर
गाली देते हुए
एकदम चले भी गए थे ...
अपने को पहले पत्थर, फिर -
पत्ते - सा काँपते हुए पाया था
दस ही मिनट में, मैं भी -
सब छोड़ - छाड़कर
तुम्हें ढूँढने निकल पड़ा था ...
तुम अपने कमरे में आ गए थे
कुछ शांत
कुछ भरे हुए
जो हुआ, क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ
उसका ज़िक्र न तुमने किया
न मैंने ...
तुम्हें कुछ देर अकेला छोड़ना सही रहेगा
यह सोचकर
मैं अपने कमरे में आ गया था
पर
तुम तो ठहरे तुम
कब ठहरे मेरे बिना
दस ही मिनट में -
तुम मेरे दरवाज़े पर
ग्यारहवे मिनट में -
मेरे बिस्तर पर
चौकड़ी मार, ऐनक चढ़ा -
बिना कुछ कहे
अपना लैपटॉप खोल
काम करने में हो गए थे मशगूल ...
मैं हैरान, हमेशा की तरह
कैसे तुम -
अपने अंदर के झंझानल को
इतनी आसानी से
बिसरा गए थे ...
मुझे पता नहीं क्या सूझा था
उस एक पल -
अपने मिट्टी के रंगों को
ज़मीन पर फैलाकर
अचानक से ही -
चूने की दीवार पर
कुछ उकेरना शुरु कर दिया था
कैसे तो सारे हाथ, कपड़े, चेहरा
सब रंग - रंग हो गए थे
मानो -
हुसैन का भूत उतर आया हो अंदर मेरे ...
लगभग डेढ़ घंटे तक साँस नहीं ली थी मैंने
लगभग डेढ़ घंटे तक तुम्हें देखा तक नहीं था मैंने
तुमने भी कुछ नहीं कहा, बल्कि -
गाने चला दिये थे !
गाने चलते रहे
दीवार रंगती रही
तुम भी हैरान
मैं भी हैरान
ढलता सूरज भी हैरान ...
हमने पाया, हमारे सामने -
बिखरे रंगों के बीच
हर तरह के रंगों से रंगे
एक पाँव पर नाचते
अपने में ही डूबे
गणपति !
मैंने पूछा - क्या नाम दूँ ?
फट से तुम्हारे मुँह से निकला था -
मौर्या ...
कैसे तुम खुली आँखों से देखते रहे
कभी मुझे
कभी मौर्या को !
कैसे तुमने अचानक से
बिस्तर पर ही खड़े-खड़े
मुझे गले लगा लिया था !
कैसे सुबह से भूखे हमने
कमरे में ही एक साथ
रात का खाना छककर खाया था !
उस रात -
मौर्या ने तुमसे साँसें पाईं थीं ...
साल - दर - साल
उस पर, चूने की -
न जाने कितनी ही परतें चढ़ गईं होंगी ...
आज सब दफ़न है !
वह दिन दफ़न
वह शाम दफ़न
तुम दफ़न !
जाते - जाते, काश तुम -
बता ही जाते
उखड़ी उधड़ी साँसों में जीते
मौर्या की -
और
मौर्या को रंगने वाले की -
मुक्ति का कोई उपाय !