Monday, 28 December 2020

The poor clock!


Reminiscences from my diary

Dec 28, 2020
Monday, 10:20 pm
Murugeshpalya, Bangalore


एक घड़ी है 
आम - सी
और चूँकि आम - सी है 
उसे आम घड़ियों की ही तरह 
चलते रहना चाहिए 
अनवरत !

कुछ पत्थर हैं 
या यूँ कह लीजिये 
कंकण हैं 
महीन - महीन 
पर ऐसे कि 
जीना मुहाल कर दें 
जैसे पथरी !

घड़ी ठीक से चल नहीं पाती 
जब तब
भटक जाती है 
अटक जाती है 
पग-पग पत्थर-पत्थर 
मानो 
उचटी नियति
जब तब 
मुट्ठी भरती है 
और बिखरा देती है 
बालू, बजरी, कंकण !

सुनो !
ऐसे ही, एक बार 
कतरा कतरा 
कंकण कंकण 
बना था 
एक हिमालय !

 

Wednesday, 9 December 2020

The creeping of the silence!

Reminiscences from my diary

Dec 09, 2020
Wednesday, 10:45 pm
Murugeshpalya, Bangalore

सन्नाटा !
आसमान जितना सन्नाटा !
बीहड़ में कल्पों से पलते किसी मकड़जाल में -
दम ठहरने के बाद जैसा सन्नाटा !

जितना सन्नाटा, उतना ही कोलाहल !
जितना कोलाहल, उतना मौन !
जितना मौन, उतने शब्द !
जितने शब्द, उतने घाव !
जितने घाव, उतने धागे !
जितने धागे, उतनी टीस !
जितनी टीस, उतने पतझड़ !
जितने पतझड़, उतने सावन !
जितने सावन, उतना नीर !
जितना नीर, उतनी स्मृतियाँ !
जितनी स्मृतियाँ, उतना ही सन्नाटा !

कांसे के प्याले पर धुंध-सी बहती धुन के -
अचानक बिखरने के बाद जैसा सन्नाटा !
आसमान जितना सन्नाटा !
सन्नाटा !

Thursday, 3 December 2020

The New Moon

Reminiscences from my diary

Dec 03, 2020
Thursday, 11:15 pm
Murugeshpalya, Bangalore


मैं यूँ ही 
बिना वजह 
एकटक 
देखे जा रहा था चाँद को !
शायद 
चाँद भी 
यूँ ही 
बिना वजह 
देखे जा रहा था मुझे !
बीच - बीच में 
यूँ ही 
बिना वजह 
मुस्कुरा उठते थे हम दोनों ही 
शायद !

फिर 
निदाघ की एक साँझ 
अचानक ही 
बिना वजह 
उतर आयी आँख में !

तुमने 
अपनी बंद मुट्ठी 
मेरी हथेलियों की ओक पर 
पलट दी थी 
यूँ ही !

"यह रहा आज की रात का चाँद - तुम्हारा"
"मेरा ???"
"हाँ ! रखो ! तुम्हारा हुआ!"

हँसते हँसते बौरा गए थे 
हम दोनों या तीनों ही !

सुनो! सुन रहे हो तो !
सच कहो !
ठिठोली की थी न !
मैं बूझ चूका हूँ !

अमावस की रात भी चाँद खिला करते हैं भला ?


Sounds at 2 AM


Reminiscences from my diary


Nov 30, 2020


Reminiscences from my diary

Monday, 2.15 am

Murugeshpalya, Bangalore


इस एक पल -

अचानक ही घड़ी पर नज़र पड़ गयी! 

रात के दो बज गए हैं! 


ओह! 

दो! 

यह तो बहुत कम समय रह गया भोर होने में! 


पर नींद? 

उफ्फ़! 

ज़रूर आते - आते नींद की कहीं आँख लग गयी है! 


इस एक पल -

सन्नाटा पसरा हुआ है! 

नीरव! 

नीरस! 

निर्जन! 

हालांकि -

मुझे महज़ दो आवाज़ें -

साफ - साफ सुनाई दे रही हैं! 


एक आवाज़ तो अपनी साँस की ही है! 

मुद्दत बाद गौर कर रहा हूँ कि -

कैसे मेरी साँस -

अंदर - बाहर 

आते - जाते 

शोर मचा रही है! 


"मैं भी हूँ, मैं भी हूँ.."

"जानता हूँ रे! तभी तो मैं हूँ!"


दूसरी आवाज़ -

झींगुरों की है! 


दो हैं? 

दस हैं? 

या फिर तारे जितने? 

पता नहीं! 

और -

यह भी नहीं पता कि -

असल में -

है कहाँ यह टोली! 

कमरे में तो नहीं है! 

ज़रूर बाल्कनी में -

मनी-प्लांट 

या ऐलोवीरा

या फिर निम्बोली के आस - पास कहीं - 

झनक रहे हैं! 


खैर .. 

इस एक पल -

यही दो आवाज़ें हैं ! 

हाँ! 

बस दो! 

बाकी तो बस वही -

सन्नाटा! 

मौन - मूक सन्नाटा! 


अरे!

तुम भी हैरान हो गए क्या? 

कहो तो! 

वैसे -

मैं भी हूँ -

हैरान! 

मैं खुद -

काफी देर से टटोल रहा हूँ

इधर - उधर ताके जा रहा हूँ

पर -

मेरे रतजगे में -

आज 

तुम्हारी आवाज़ -

दूर - दूर तक नहीं है..!

Friday, 23 October 2020

It was your photograph! 


Reminiscences from my diary

Oct 23, 2020

Friday, 07.00 pm

Saharanpur


हुआ कुछ यूँ आज कि -

मुद्दत बाद एक दोस्त ने याद किया। 

मुझे हल्का - हल्का याद है कि आखिरी बार, उससे बात -

अरसा पहले फूजी की चोटी देखते हुए की थी। 

अपने देश से सैकड़ों मील दूर, हम -

इत्तेफाक़न एक ही समय में एक ही दूसरी मिट्टी नाप रहे थे, हालांकि -

मिलना नहीं हो पाया था तब भी! 


तो खैर, कुल मिलाकर -

इन साहब से पिछले दस सालों में -

एक मुलाकात, 

और आज को मिलाकर -

कुल तीन दफ़ा बात हुई है! 


बात करते करते साझा की उसने -

एक पुरानी तस्वीर! 

सुंदर तस्वीर! 


यह तस्वीर मेरे पास नहीं थी। 

शुक्रिया कहा उसको -

बिसरी गली में ले जाने के लिए! 


बातें होते होते कम हुई जा रहीं थी, 

एक सवाल कौन्धा मन में तभी कि -

आज अचानक इतने वक़्त बाद कैसे याद आ गयी! 


कहने लगा - तस्वीर देखी, और बस..! 


मैं खुश - सा हुआ पर, अगले ही पल, हैरान! 

मैं तो उस तस्वीर में हूँ भी नहीं, मैंने कहा! 


उसने कुछ नहीं कहा! बस हँस दिया!


सुनो!

सुन रहे हो? 

मुझे याद आ गया है। 

यह तुम्हारी अपनी सबसे पसंदीदा तस्वीर थी न?

Wednesday, 22 July 2020

You could be but you!

Reminiscences from my diary

July 23, 2020
Thursday, 01:30 am
Murugeshpalya, Bangalore


सोचो ! अगर तुम होते -
एक दीवार
तो मैं, तुम पर
चढ़ता
उतरता
और फिर चढ़ता
एक मटमैला रंग होता !

और अगर होते तुम -
एक दरख़्त, तो ?
मैं तब बन जाता
तुम्हारी कोटर में छिपाई
निम्बोली, या
कच्चा आम, या
बचपन का कोई ग़ुम आना !

होने को तो तुम हो सकते थे -
कोई दरगाह
मैं हो जाता फिर
किसी मन्नत
किसी ख़्वाहिश
किसी ख़ुशबू में लिपटा
एक धागा !

अगर सोचूँ तुम्हें -
धूप
तो खुद को पाऊँ
तुम्हारी राख में
तुम्हारी राख से
साँस सींचती
अधबुझी आग !

और 'गर मानूँ तुम्हें -
अंजुली भर
तो मैं
तुम्हारी ओक में सिमट जाता
एक आँसू बनकर
या होकर
एक समंदर !

तुम कुछ भी हो सकते थे, बस -
सिर्फ़ तुम नहीं होना था तुम्हें !

हुआ यूँ कि -
तुम्हारे महज़ तुम होते ही
मैं मैं नहीं रहा  ... !



Monday, 22 June 2020

Maurya


Reminiscences from my diary

June 23, 2020
Tuesday, 00:30 hrs
Murugeshpalya, Bangalore


याद है, कैसे वह पूरा दिन
झल्लाहट में बीता था तुम्हारा
और तुम्हें देख - देख मेरा ?
तकदीर दिन की ख़राब थी या तुम्हारी -
आज भी बूझता हूँ जब सोचता हूँ ...

उस दिन इतने सालों में
पहली बार
तुम्हारा गुस्सा देखा
कैसे तुम्हें भरे ऑडिटोरियम में
बाहर निकल जाने को कहा गया था !
कैसे तुम पैर पटककर
गाली देते हुए
एकदम चले भी गए थे ...

अपने को पहले पत्थर, फिर -
पत्ते - सा काँपते हुए पाया था
दस ही मिनट में, मैं भी -
सब छोड़ - छाड़कर
तुम्हें ढूँढने निकल पड़ा था ...

तुम अपने कमरे में आ गए थे
कुछ शांत
कुछ भरे हुए
जो हुआ, क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ
उसका ज़िक्र न तुमने किया
न मैंने ...

तुम्हें कुछ देर अकेला छोड़ना सही रहेगा
यह सोचकर
मैं अपने कमरे में आ गया था
पर
तुम तो ठहरे तुम
कब ठहरे मेरे बिना
दस ही मिनट में -
तुम मेरे दरवाज़े पर 
ग्यारहवे मिनट में -
मेरे बिस्तर पर
चौकड़ी मार, ऐनक चढ़ा -
बिना कुछ कहे
अपना लैपटॉप खोल
काम करने में हो गए थे मशगूल ...

मैं हैरान, हमेशा की तरह
कैसे तुम -
अपने अंदर के झंझानल को
इतनी आसानी से
बिसरा गए थे ...

मुझे पता नहीं क्या सूझा था
उस एक पल -
अपने मिट्टी के रंगों को
ज़मीन पर फैलाकर
अचानक से ही -
चूने की दीवार पर
कुछ उकेरना शुरु कर दिया था
कैसे तो सारे हाथ, कपड़े, चेहरा
सब रंग - रंग हो गए थे
मानो -
हुसैन का भूत उतर आया हो अंदर मेरे ...

लगभग डेढ़ घंटे तक साँस नहीं ली थी मैंने
लगभग डेढ़ घंटे तक तुम्हें देखा तक नहीं था मैंने
तुमने भी कुछ नहीं कहा, बल्कि -
गाने चला दिये थे !

गाने चलते रहे
दीवार रंगती रही
तुम भी हैरान
मैं भी हैरान
ढलता सूरज भी हैरान ...

हमने पाया, हमारे सामने -
बिखरे रंगों के बीच
हर तरह के रंगों से रंगे
एक पाँव पर नाचते
अपने में ही डूबे
गणपति !
मैंने पूछा - क्या नाम दूँ ?
फट से तुम्हारे मुँह से निकला था -
मौर्या  ...

कैसे तुम खुली आँखों से देखते रहे
कभी मुझे
कभी मौर्या को !
कैसे तुमने अचानक से
बिस्तर पर ही खड़े-खड़े
मुझे गले लगा लिया था !
कैसे सुबह से भूखे हमने
कमरे में ही एक साथ
रात का खाना छककर खाया था !

उस रात -
मौर्या ने तुमसे साँसें पाईं थीं ...

साल - दर - साल
उस पर, चूने की -
न जाने कितनी ही परतें चढ़ गईं होंगी ...

आज सब दफ़न है !
वह दिन दफ़न
वह शाम दफ़न
तुम दफ़न !
जाते - जाते, काश तुम -
बता ही जाते
उखड़ी उधड़ी साँसों में जीते
मौर्या की -
और
मौर्या को रंगने वाले की -
मुक्ति का कोई उपाय !