Friday, 15 January 2016

Baba ... 

Reminiscences from my diary
Nov 26, 2006
12:30 AM
Saharanpur

शाम में टहलते हुए बरबस ही नज़र पड़ गयी एक मोटी उँगली थामे उस नन्हे हाथ पर  ... ज़रूर पार्थ के दादाजी हैं ! और फिर समय की सबसे छोटी इकाई जितना ही समय लगा मेरे बाबा को मुझ तक पहुँचने के लिए ! देखा तो मेरे बाबा भी मेरे साथ चल रहे थे !

सच, जीवन के वे पंद्रह बरस और  इन बरसों का हर लम्हा स्मृतियों की एक सुदीर्घ श्रृंखला बना गया जो मुझे अपने कल से और उस कल में जीते बाबा से हमेशा ही जोड़े रखता है ! यूँ तो बाबा के हर रूप पर , उनकी हर याद पर , स्मृतियों की इस श्रृंखला की हर कड़ी पर मन भाव - विह्वल हो उठता है , पर एक रूप ख़ास तौर पर ऐसा है , जिस पर मन बलिहारी हो हो जाता था  - तब भी , और आज सोचता हूँ, तो आज भी !

सावन की फुहारों में , मदमस्त बयार के साथ में , जब तहमद और अपने पसंदीदा कागज़ी रंग के कुर्ते में, हाथ में छतरी लिए वह बाहर से पान चबाते हुए आते थे , और 'बाबा' पुकारने पर 'बेटा जी' कहकर गले लगा लेते थे , तो ऐसा लगता था कि जीवन का चरम सुख मिल गया हो ! बाहों का वह घेरा आज तक अपना सामिप्य प्रदान करता है मुझे ! बाबा की यह छवि मन को अनायास ही आह्लादित कर देती है और ऐसा प्रतीत होता है मानो समय ठहर गया हो और ले गया हो मुझे सावन की उन्ही फुहारों में , उसी मदमस्त बयार के बीच , उन्ही बाहुपाश में , और गूंजने लगता है एक स्वर  .... 'बेटा जी' ... !

रौबीला व्यक्तित्व , कोमलता और कठोरता का अद्भुत समन्वय , दुनियादारी की उत्तम तहज़ीब , औरों की सहायता , और अपने पोता - पोती से सबसे अधिक लगाव  - ऐसे थे मेरे बाबा ! यूँ तो ताऊजी के दोनों बेटे हमसे बड़े थे , पर बाबा ने कभी देहरादून जाकर उनके पास रहने के लिए  नहीं कहा। बाबा के लिए तो बस उनके ये पोता - पोती ही सब कुछ थे। कैसे भुला दूँ गोधूलि के वे कालांश जब तैयार होकर वे हम दोनों को अपने साथ घुमाने ले जाते थे - रानी बाज़ार के पातालेश्वर मंदिर में 'भगवान जी' को फूल चढ़ाना , फिर मंदिर के बाहर वाली दुकान पर 'गोली वाला लिम्का' पीना , लौटते हुए 'टॉफियां ' और 'इमली के गोले' खरीदना , 'पतली गली ' वाले रास्ते से लौटना , लौटते हुए 'गफ्फार पानवाले ' से मिलना  ... न, क्यों भूलूँ इन सब को मैं !

भुलाये नहीं भूलता उनका वह हृदयग्राही रूप जब सूट-बूट पहने ,  करीने से टोपी मफलर लगाये वह चौक में जाने के लिए तैयार होते थे और छोटी - सी आयु के यह कहने पर कि - बाबा, काला टीका लगा लो , कहीं आपको नज़र न लग जाये - वह आयु को गले से लगा लेते थे और निहाल हो जाते थे - इतने 'हैंडसम ' थे मेरे बाबा !

रोज़ देर शाम को जब मैं 'इन्सुलिन' लेकर चौक में जाता था, बाबा अपने 'बेस्ट फ्रेंड' इंजीनियर अंकल के  गप्पे मारते मिलते थे।  'जैन साब ' ... हमारे अंकल 'जैन साब' की दुकान और उस दुकान का चबूतरा रोज़ शाम उनकी महफ़िल जमने का अड्डा होते थे।  कितनी सुन्दर थीं वे शामें , वे हंसी - ठहाके , वे बातें ! लौटते हुए बाबा हमेशा मेरे दाईं तरफ चलते थे और अपना बायां हाथ मेरे कंधे पर रखकर ढेर सारी बातें करते थे , 'मुझे कोका-कोला' और खुद 'फैंटा' पीते थे।  आज तक मुझे अपने बाएं कंधे पर उनका स्पर्श अनुभव होता है और जानता हूँ, हमेशा होता रहेगा !

कितने 'एक्टिव' थे मेरे बाबा !   जो भी काम करना है, वह करते थे - परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों ! कोई आलस्य नहीं, कोई निराशा नहीं , समय अनुकूल हो या प्रतिकूल - अपनी अंतश्चेतना को हमेशा तंदरुस्त रखते थे।  सुबह उठकर दूध लेने जाते थे - गर्मी हो या सर्दी , मौसम ख़राब हो या तबियत - उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आता था।  अपना काम  गुनगुनाते रहते थे।  सवेरा होने पर मुझे उठाने का काम उन्ही का था।  मंदिर से लौटने के बाद नाश्ता करते और साइकिल पर बाज़ार की तरफ निकल जाते थे।  लौटने पर गली के बाहर से ही मुझे चार बार पुकारते थे - "शानू बाबू ,  शानू जी  .... शानू जी , शानू बाबू " - दुनिया के सभी मिष्ठानों में इतनी मिठास नहीं होगी जितनी मीठी उनकी आवाज़ होती थी।  उनके होने का यह एहसास अप्रतिम थे - तरसते हैं ये कान उसी गूँज, उसी आवाज़ के लिए।

कभी कुछ, कभी कुछ - रोज़ हम बच्चों के लिए कुछ - न - कुछ लाते थे।  मंगलवार के दिन 'मंगल बाज़ार' से मेरे लिए ढेरों ढेर नंदन, चम्पक, चन्दामामा , सुमन - सौरभ आदि किताबें लाते थे।  वही तो थे  जिनसे मैंने कहानियों के किरदारों से बातें करना सीखा ! रोज़, दिन में बाज़ार से आने के बाद , तहमद बदलकर , बड़ी कुर्सी पर बैठकर , चश्मा लगाकर, खीरा खाते हुए अखबार पढ़ते थे - एक  और छवि जो रूह तक घुली हुयी है। जहाँ दो बजे , वह टी.वी.  देखते हुए हमारे स्कूल से आने का इंतज़ार करते रहते थे और जब तक हम दोनों स्कूल से नहीं आते थे, खाना नहीं खाते थे।  हम दोनों से सलाद की थाली वह स्वयं लगाते थे।  आयु से लड़ाई होने पर हमेशा उसी का पक्ष लेते थे और कहते - कोई बात नहीं, छोटी बहन है। दिवाली हो या फिर नव वर्ष का आगमन, हमेशा हम दोनों को अपने साथ ले जाते थे और ' टीचर्स' के लिए 'ग्रीटिंग कार्ड्स' दिलवाते थे। शायद इसी लिए आज भी 'ग्रीटिंग कार्ड्स' बहुत पसंद हैं मुझे !

बीमार होने पर हमारा पूरा ख्याल रखना , कभी कहीं जाने पर हमारे लौटने की राह देखना , हमारे बिना मन न लगना , रोज़ रात में टी.वी. पर होने वाली नोक-झोंक , गर्मियों में  बड़े कमरे में कूलर के सामने सोना , सर्दियों में छत  पर बैठकर नाश्ता करना , दाढ़ी बनाना , रात में बिजली न होने पर लालटेन की रोशनी में एक साथ खाना खाना - सच असंख्य पल हैं, असंख्य स्मृतियाँ ! क्या -क्या और कैसे एक - एक को पन्नों पर उकेर दूँ!

 सर्दियों में  रजाई में बैठकर मूंगफली कहते थे और हम दोनों को छील - छील कर खिलाते रहते थे और कहानियां सुनाते रहते थे।  आज भी सर्दी की वह एक शाम पाने के लिए सब कुछ अर्पण कर सकता हूँ। उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि पापा हमारे साथ  वक़्त बिताते हैं और पढ़ाई के अतिरिक्त कोई और बात नहीं करते थे।  वास्तव में अपने शैशव पर नज़र डालूं तो बस बाबा ही नज़र आते हैं।  

लिखते - लिखते एक और शाम दस्तक दे गयी है - जब मुझे स्कूल के जूते और घड़ी दिलवाने 'नया बाज़ार' ले गए थे - पांच सौ अस्सी रुपए के बाटा के जूते - आज भी मैंने अपने पास रखे हुए हैं।  कितना डांटा था पापा ने मुझे इतने महंगे जूते खरीदने के लिए , पर हमेशा की तरह बाबा ने सब सम्भाल लिया था।  

जब भी हम 'गुगाल' के मेले गए , उन्ही के साथ।  हर साल वह ही मेला घुमाते, झूले झुलाते ,  'ऑरेंज - बार' खिलाते , 'सर्कस' दिखाते - स्वर्णिम समय था वह, जब उनका प्रत्यक्ष सानिध्य मिला था ! छोटी होली से पहले हमारे लिए गुब्बारे, रंग, पिचकारी लाते थे।  फाल्गुन का आरम्भ उनके माथे पर लाल टीका लगाकर मैं ही करता था और वह छत के कमरे के दरवाज़े खोलकर अखबार पढ़ते हुए होली की फ़िज़ाओं का आनंद लेते थे। धनतेरस के दिन बुरादा लाकर खुद रंगते थे , धूप में रंगों को सुखाते थे और फिर मेरे और आयु के आँगन में रंगोली बनाने पर झूम से जाते थे  ... 

दो बज गए हैं। सुबह जल्दी उठना है !  विराम देना होगा , वैसे भी ये पिटारा कभी खाली नहीं वाला! आज के मरुस्थल के लिए बाबा न सही, उनकी स्मृतियों का सलिल ही सही , तर जाता हूँ उनके ख्याल से ही !




Sunday, 20 December 2015

Scattered!



Reminiscences from my diary

December 20, 2015
Sunday
2:00 AM


बोझिल -सा दिन था, बोझिल - सी सिलवटें -
आँख लगने ही वाली थी -
कि इधर उधर बिखरे -से कुछ ख्याल -
खिड़की से झांकते दिखाई दिए !

सीली - सी शब थी -
हाथ में कॉफ़ी का मग -
साहिर की याद में लिखी अमृता की कुछ नज़्में -
और तेरा ख्याल !

फिर एक भोर थी -
कमरे में घुसने की कोशिश करती धूप -
अधमुंदी आँखों पर तकिया -
और तेरा ख्याल !

पराया - सा मुल्क -
अजनबी मुस्कुराहटें -
चेहरों में गुम होती भीड़ -
और तेरा ख्याल !

शिव की आरती - 
शंखनाद और घंटियाँ -
एक, पूजा की थाली , और दूसरा -
तेरा ख्याल !

दिसंबर की कुछ गहरी कपकपाहटें -
अंगीठी में चटकते कच्चे कोयले -
बराबर में रखी खाली कुर्सी -
और तेरा ख्याल !

ख्याल ... सिर्फ़ ख्याल हैं -
ख्यालों में गुम होते और ख्याल -
और फिर खिड़की से झाँकते कुछ नए ख्याल -
पर काश कभी कुछ यूँ सा होता  -
कोई ख्याल ऐसा होता -
जो बस एक ख्याल -सा होता !




Friday, 27 November 2015


Whispers of the lost!


Reminiscences from my diary
October 7, 2012
11:45 PM
#750, IISc


आहटों के चेहरे -
छितरे - छितरे से -
बिखरे - बिखरे से -
यत्र तत्र सर्वत्र !








कुछ चेहरे  ... कई चेहरे ,
उदासी भरे -
फड़फड़ाते होंठ ,
भरी आँखें -
गालों पर सूखी पड़ती -
-  गीली रेखाएँ  ...
शिकायत करते -
तड़पते -
विलाप करते -
और फिर -
शून्य में खो जाते !



अगली आहट पर दिखाई दिए -
'खुश' चेहरे -
पर बहुत कम ,
बहुत धुंधले -
चमकते - से नयन थे शायद -
शायद मुस्कुराते अधर -
खिले कपोल -
गुनगुनाते -
खिलखिलाते -
इठलाते -
और फिर अचानक ही -
शून्य में खो जाते !



फिर, सामने आये -
आहटों के कुछ और चेहरे ,
छिपे हुए -
मौन नेत्र -
मौन ही होठों का युग्म भी -
भावहीन -
संज्ञाहीन -
न कोई शिकायत -
न ही कोई सुकून -
बस आम के ठूंठ से ,
और फिर ,
वे भी -
अगले ही क्षण -
शून्य में खो जाते !

काश !
कुछ यूँ सा होता -
शून्य में -
चेहरों  के साथ - साथ -
आहटें भी खो पातीं !











Sunday, 22 November 2015


I crave to meet me!


Reminiscences from my diary
January 19, 2014 Sunday
11:00 PM
Murugeshpalya, Bangalore


मलंग होने को जी चाहा आज -
क्यों  … नहीं जानता !
कहाँ  … यह भी नहीं पता !
बस चाहा -
खो जाऊं कहीं -
अपनी ही रूह में !
गुम हो जाऊँ -
अपने ही ज़हन में !
रंग जाऊँ -
अपने ही रंग में !
मलंग!




मलंग  … 
न मीरा - सा -
न खुसरो - सा -
न रूमी - सा -
न ही हीर - सा !
डूबूँ , तो फिर -
- स्वयं में डूबूँ -
और ऐसे डूबूँ -
- कि फिर किसी और समंदर की -
- चाह न रहे !



हो जाऊँ ज़ार - ज़ार -
अपने ही तारों में -
अपने ही तारों से !
जलूँ तो जलूँ -
- अपनी ही आग में  … 
दहक भी मैं , मैं ही पतंगा -
और, हवा में उड़ती राख भी मैं !




और , अगर बदलूँ -
तो फिर सलिल - सा !
मिल जाऊँ अपने ही किसी रूप में -
अपने में ही डूबता -
फिर अपने ही किनारे तरता -
बहता -
गुज़रता -
मलंग  … !



Thursday, 12 November 2015

Strings, transformed!


Reminiscences from my diary
December 27, 2013
Friday, 2:30 pm
Crystal Downs, Bangalore


मैंने अक्सर महसूस किया है -
जिस भी शब -
तू -
और तुझसे जुड़े बंधन -
शिथिल - से-
मालूम  होते हैं  …
जिस भी रात -
वक़्त के कांच से -
तेरे अस्तित्व से जुड़े धागे -
तड़पते -
बिलखते -
टूटते - से -
तार - तार होने लगते हैं  …
तब,
अगली सुबह -
कायनाती हो जाती है !

अगले दिन -
एक अलग ही सूरज उगता है -
जिसकी -
कतरा भर रोशनी -
इस मरते बंधन में -
जान - सी फूँक जाती है  …
तड़पते - बिलखते धागों पर -
मुस्कराहट - सी छोड़ जाती है !

और तब -
तब लगता है , मानो -
तू है !
तू यहीं है !
इस नए सूरज में -
इस नए सूरज की नयी रोशनी में -
इस नयी रोशनी से झिलमिलाते सलिल में -
इस सलिल से सीली हवा में -
इस हवा में सिमटी खुशबू में -
हर दिशा में -
हर गुंजन में -
हर अलंकार में -
उस रूह से इस रूह तक आती हर रूह में-

तू है !
तू यहीं है! 








Sunday, 18 October 2015

Those musical evenings!



Reminiscences from my diary
February 7, 2014
6:15 PM, Bangalore

Happy Birthday, Salil!

काम करते करते अचानक ध्यान गया -
कि होठों पर -
कोई गाना थिरक रहा है  … 
हँस पड़ा मैं -
मुद्दत बीत गयी है -
किसी के संग अंताक्षरी खेले हुए -
शाम - ए  - महफ़िल सजाये हुए -
गाते गाते खिलखिलाते हुए -
और खिलखिलाकर फिर गाते हुए !



न सुरों की चिंता -
न लय का ज्ञान !
बस, नग्मों का खज़ाना,
और खुशियों की शाम !







 
कभी किसी गोधूलि, मेघों में कैद -
- सलिल भी -
बरस पड़ता था -
मानो, घुलना चाहता हो -
चाय की चुस्कियों में -
पकौड़ों के सरसो में -
शोर में -
ठहाकों में  …!


लग जाते थे चार चाँद जब -
बिजली के बल्ब की जगह -
लालटेन की लौ -
नई - नवेली दुल्हन सी -
महफ़िल में शामिल होती थी -
और,
कुछ हवा से -
कुछ धुनों से -
और कुछ, मूंगफली के छिलकों से भी -
बौराई - बौराई जाती थी !
वहां , दूर गगन में -
आधे - अधूरे चाँद को छोड़ -
झूमती ज्योत्सना भी  -
चुपके-चुपके -
रोशनदान की टूटी जाली से -
घुसने की कोशिश करती रहती थी !

सच  … 
मुद्दत बीत गयी है !
अब तो -
- जब भी कभी मन करता है -
और, समय कुछ पल मेरे पास रुकता है -
तो कोई भूला - बिसरा गीत -
याद कर गुनगुना लेता हूँ -
और,
दूर हो जाती है तन्हाई -
मेरी भी -
और गीत की भी !






Saturday, 3 October 2015

प्रणय (२/२)

Reminiscences from my diary
May 10, 2010
3 PM, Greater Noida



… अगले ही दिन से कुछ परिवर्तन हुआ ! अब क्रिया यथार्थ से मिलने अकेले नहीं आती थी बल्कि प्रणय को भी साथ लाती थी।  प्रणय - क्रिया ने उसी दिन नाम रख दिया था।  पहले स्पर्श से ही कुछ अलग सी सिहरन दौड़ गयी थी उसमें।  विधाता के उस उपहार को उसका प्रेम समझकर स्वीकार  किया था उसने।  मानवता का एक रूप ऐसा भी  होता है - सुन्दर , शिव , सत्य !

और यथार्थ  …   वह अब भी वैसा  ही था।  अपनी उस संकीर्ण परिधि  के चारों ओर लम्बी - लम्बी दीवारें बनायीं हुई थीं उसने , जिसके अंदर सिर्फ क्रिया का प्रवेश स्वीकार्य था।  और , वह , नन्ही - जान जानता नहीं था उस गुप्त द्वार का रहस्य , जो यथार्थ की आत्मा , उसके हृदय तक पहुँचता था।

और फिर पल - पल बीतते गए ।  वही यथार्थ , वही क्रिया , वही उनके मिलन का एक घंटा , उनके मौन- मूक प्रेम के साक्षी वही लहरें , वही बादल , वही रेत , वही कंकड़ , वही नारियल के पेड़ और वही क्षितिज।  यूँ तो क्रिया के जीवन में यथार्थ ने जाने - अनजाने कई रंग भरे थे , पर प्रणय ने उसकी मातृत्व की तूलिका को अपनी अठखेलियां , अपनी शरारत , अपनी ठिठौली और अपनी खिलखिलाहट के रंगों से सजा दिया।  प्रणय ने तो मानो उसके कंठ को और सुरीला कर दिया।   एक सुन्दर - सा , अति सुन्दर - सा बंधन था यह - मानवता का, वात्सल्य का,  मैत्री का, प्रेम का  … !

पर यथार्थ  … ? पल पल बीतते पलों ने एक बार भी यथार्थ के हृदय में  प्रणय को मन से देखने की , उसे अंक में खिलाने की ,  उसके गालों को अपने होठों से स्पर्श करने की , हवा में उड़ते उसके बालों को संवारने की उमंग पैदा नहीं की। क्रिया ने कई बार सोचा था और एक बार आसमान की ओर देखकर पूछा भी था कि क्या वाकई कोई इतना संवेदना - शून्य हो सकता है ! पर उस एक बार के बाद वह यह बात कभी अपने  मन में नहीं लायी क्योंकि वह जानती और समझती थी अपने यथार्थ को , और ईश्वर से ज़्यादा समय पर विश्वास करती थी। मानती थी कि शायद समय ही यथार्थ के मन में स्नेह का बीज  बो दे जिसके फल क्रिया ही नहीं बल्कि प्रणय भी चखेगा।  पर  … !

क्रिया को सपने नहीं आते थे , शायद इसीलिए प्रणय की तोतली बोली से सपने सुनने में उसे बहुत मज़ा आता था।  बड़ा होता प्रणय क्रिया को जीजी कहकर पुकारता था।  उसके बिना एक पल नहीं रह सकता था।  सारा दिन इर्द - गिर्द डोलता रहता था।  उसके नन्हे पाँव क्रिया की परिक्रमा करते थकते ही नहीं थे। क्रिया की तरह प्रणय का नन्हा मन भी इंतज़ार करता उस एक घंटे का जब वह अपने यथार्थ भैया से मिलेगा।  यथार्थ को भैया कहना क्रिया ने ही सिखाया था।  यथार्थ की आँखें प्रणय को बहुत अच्छी लगती थीं पर अपनी जीजी की आँखें बिलकुल पसंद नहीं थीं। प्रणय अक्सर सोचा करता था कि यथार्थ भैया उससे बात क्यों नहीं करते और यह बात उसने अपनी प्यारी जीजी से भी पूछी थी।  तब क्रिया ने ऐसे ही बोल दिया था - " तुमने कोई अच्छा काम नहीं किया न ! कुछ अच्छा करोगे तो यथार्थ भैया बहुत प्यार करेंगे।  " और उस तोतली बोली ने कहा था - "जीजी, मैं पक्का कुछ अच्छा काम कलूँगा !"

बड़ा हो रहा था प्रणय।  लगभग नौ साल का हो गया था।  अब वह क्रिया के अंक में नहीं होता बल्कि साहिल पर अन्य बच्चों के साथ खेलता था।  दोस्तों के साथ मिलकर समुद्र में दूर तक निशाना लगाता।  पिट्ठू का खेल उसे बहुत पसंद था और पसंद थी उसे यथार्थ की तरह ही नीली आँखों वाली एक लड़की जो नित्य उसी समय अपनी सहेलिओं के साथ खेलने आती थी।  पर उसने यह बात किसी को बताई नहीं थी - न किसी दोस्त को, न ही अपनी जीजी को।  कभी कभी शर्मीला सा बन जाता था प्रणय।  उसके साथियों को उसका नाम बहुत पसंद था और वह शान से कहता - मेरी क्रिया जीजी ने रखा है मेरा नाम !

कद में  बढ़ने के साथ - साथ प्रणय के मन के किसी कोने में छिपी टीस भी बढ़ती जा रही थी - आखिर ऐसा क्या करूँ जिससे मेरे यथार्थ भैया मुझसे बात करें , मुझे प्यार करें ! मन से , हृदय से ,  रिश्ते से और न जाने किस अधिकार से वह यथार्थ को वास्तव में अपना बड़ा भाई मानता था।  अगर क्रिया उसके लिए सर्वस्व थी तो वह यथार्थ को भी अपना सर्वस्व मानता था।  आखिर उसकी नन्ही - सी दुनिया इन्ही दो लोगों से ही तो सुशोभित थी।  

… और फिर एक दिन नाराज़ होकर , या फिर मन में कुछ ठानकर उसने क्रिया के साथ जाना छोड़ दिया।  अब वह यथार्थ से नहीं मिलता।  क्रिया के साथ नहीं जाता।  बात भी कम करता।  उस नन्हे मस्तिष्क में न जाने क्या चल रहा था।  बारह साल का मानस उम्र से अधिक गंभीर हो चला था।  शुरुआत में क्रिया ने भी ध्यान नहीं दिया पर समय के साथ साथ क्रिया को भी अजीब लगने लगा था।  अब न प्रणय उससे गाना गाने के लिए ज़िद करता और न ही उसकी आँखों की बुराई करता।  

एक दिन बीता  … फिर दो, फिर पांच  … यथार्थ के मन में पहली  बार एक हूक सी पैदा हुई।  क्यों ? क्यों आजकल प्रणय क्रिया के साथ नहीं आता ? पर यथार्थ तो यथार्थ था ! मुद्दतों बाद प्रणय  के लिए पनपी इस हूक को भी उसने संवेदना से शून्य अपने हृदय में कहीं दबा दिया।  और फिर  … 

… यथार्थ भी शायद नहीं जानता था कि प्रणय को वह फिर कभी नहीं मिल पायेगा।  पत्थर बनी क्रिया ने एक महीने बाद एक मुड़ा - तुड़ा कागज़ का टुकड़ा लाकर यथार्थ के हाथों में दिया और इतने सालों में पहली बार चली गयी , वह भी दो मिनटों में ! आज न हवा चली , न उसके बाल उड़े , न वह गुनगुनाई ,  न ही कुछ कहा !
यथार्थ उसे जाते हुए बस देखता रहा - दूर तक ! हाथ में कागज़ का वह बेजान - सा टुकड़ा फड़फड़ाने का असफल प्रयास कर रहा था।  आज पहली बार यथार्थ के मन में एक उथल - पुथल मची हुयी थी मानो सिमटा हुआ सा एक तूफ़ान बाहर आने के लिए तड़प रहा हो , और यथार्थ को भी तड़पा रहा हो ! पहले कम, फिर ज़्यादा , फिर और ज़्यादा - यथार्थ के हाथ कांपने लगे थे।  संज्ञा - शून्य से उसके मानस- पटल पर न जाने कितनी ही बातें दस्तक दे रहीं थीं।  पहले जाती क्रिया को और फिर एकटक क्षितिज को बहुत देर तक निहारता रहा।  आँखें क्षितिज से हटीं ही थीं कि यथार्थ की नज़र उस नीली आँखों वाली लड़की पर पड़ गयी जिसे प्रणय चुपके - चुपके निहारा करता था।  कहीं - न - कहीं यथार्थ भी उस चोर - नज़र को चोरी - चोरी ताकता था।  एक हल्की - सी मुस्कराहट यथार्थ के पतले होठों पर बिखर गयी।  सोचा - कल यथार्थ से खुद ही मिलूंगा और उस नीली  आँखों वाली लड़की के नाम से सताऊंगा , बताऊंगा कि मुझे सब पता है ! सोच ही रहा था यथार्थ कि एक झोंका सा आया बयार का।  फड़फड़ाने की आवाज़ आई। नज़र कागज़ पर गयी।  धीरे - धीरे सिलवटें खोली - 

" यथार्थ भैया  … 

बहुत मेहनत के बाद मुझे आपका नाम लिखना आया है। आपका नाम सुन्दर है पर मुश्किल भी तो कितना है। मैंने अपनी हिंदी वाली टीचर से सीखा है। भैया, मैं जा रहा हूँ  - क्यों , कैसे - पता नहीं , या शायद पता है पर कहना नहीं चाहता ! पर जानता हूँ कि आपको पता चल जायेगा - जीजी से, या फिर मेरे दोस्तों से , या फिर मेरे स्कूल की वो हिंदी वाली टीचर से। खैर छोड़िये -
भैया, मुझे पता है कि आप जानते हो मुझे वह लड़की जिसकी आँखें नीली नीली सी हैं , बहुत अच्छी लगती है। है न ? मुझे पता है कि आप मुझे चुपके - चुपके देखते थे।  पर भैया, आपने कभी कुछ कहा क्यों नहीं ? जब भी मिलता , सोचता कि आज आप ज़रूर बात करोगे , गोद में उठाओगे , गालों पर प्यार से एक थपकी दोगे  … !
एक बार क्रिया जीजी से पूछा था मैंने - आप मुझसे बात क्यों नहीं करते। तब जीजी ने कहा था कि जब मैं कुछ अच्छा करूँगा तब आप मुझे ढेर सारा प्यार करोगे। 
भैया , वादा करो कि आप मेरी यह पहली और आखिरी बात मानोगे।  मैं चाहता हूँ कि  जब मैं भगवान जी के पास जाऊं , तब आप मेरी आँखें क्रिया जीजी को दे देना।  आप मेरी मदद करोगे न  … ? मैं हमेशा से चाहता था कि मेरे जीजी मेरे यथार्थ भैया को देखें जो उनसे इतना प्यार करते हैं। 
मैं इससे बड़ा काम नहीं कर पाऊँगा , भैया।  और हाँ ,  भैया, मैंने अपनी कुछ तसवीरें छोटे कमरे की अलमारी में रखी हैं।  जीजी को दिखाना। 
बस एक आखिरी बात , भैया  …! आपको पता है , मैं हमेशा ही आपकी आँखों को छूना चाहता था। इसलिए , एक बार मेरी उँगलियों को अपनी दोनों आँखों पर फेरना  … !
आपसे ढेरों - ढेर बातें करना चाहता हूँ भैया  … पर  … !
मेरी जीजी को मेरी तरफ से ढेर सारा प्यार देना और कहना कि अब उनकी आँखों की बुराई कोई नहीं करेगा। 

चलता हूँ , भैया !

काश … !

प्रणय "

*****