And you still survive?
Reminiscences from my diary
June 16, 2025
Monday 2215 IST
Murugeshpalya, Bangalore
फ़क़त इतनी-सी बात है
कि कभी-कभी
आपसे आपका आप
सम्भाले नहीं सम्भलता
एक घुटन जो जाती नहीं
एक साँस जो आती नहीं
जैसे कोई भोंके खंजर
सलीके से, धीरे-धीरे, बार-बार
जिस्म ख़ून-ख़ून
आँख बंजर-बंजर
अंदर छाती में या आस-पास कहीं
एक या फिर कई दर्द अजीब
यूँ कि जैसे समंदर का सारा ख़ारा
मसल दिया हो ज़ख्म-ज़ख्म
फिर भी न चीख़ न अश्क़
कि हो हयात ग़ुम-ज़दा
हाँ! फ़क़त इतनी-सी ही बात है
कि कभी-कभी
एक कहानी, या आलम ठहर जाता है, और
चलता चलता है पहर-दर-पहर
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